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30 साल से जन समस्याओं के लिए जूझ रहे हैं दूसरे गांधी

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Oct 23 2017 1:31PM
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एटा. गांधी जी, यानी मोहनदास करमचंद गांधी, हमारे राष्ट्रपिता. उनको तो पूरी दनिया जानती है, लेकिन आज हम आपको मिलवाएँगे एक ऐसे व्यक्ति से जो गाँधी जी के आदर्शों पर चलकर दूसरे गाँधी बन गए हैं. आम लोगों के लिए सैकड़ों अनशन करने वाले, आफिस दर ऑफिस ठोकर खाने वाले यह गाँधी हैं दयाराम. जिनको समाजसेवा की सनक के कारण एक नया नाम भी मिल गया है और वह नाम है पागल. यानी कि दयाराम पागल.

दयाराम पागल आज भी राष्ट्र पिता बापू की तरह लोगों की समस्याओं को को सुलझाने के लिए सैकड़ों दिन तक एटा से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक सत्याग्रह व अनशन कर चुके हैं.

एक और गांधी लोगों के बीच आम लोगों की समस्याओं को लेकर उनके हक की लड़ाई लड़ने वाले दुबले पतले शरीर के गांधीवादी विचारों वाले दयाराम हैं. बगैर किसी स्वार्थ के लोगों की की लड़ाई लड़ने वाले दयाराम की 33 सालों से जंग जारी है. मूलभूत सुविधाओं जैसे सिंचाई, पानी, स्वास्थ्य, सड़क जैसे मुद्दों के लिए जिला मुख्यालय से लेकर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक में कई बार अनशन कर चुके हैं. पागल उपनाम मिलने से इनको कोई शिकवा नहीं है.

जलेसर गांव के नगला मीरा में जन्मे दयाराम है ने दिल्ली के कई बड़े-बड़े नेताओं से आम लोगों की दिक्कतें दूर करने की गुहार लगाई लेकिन जब उनकी बात कहीं भी गंभीरता से नहीं सुनी गई तो 1983 से से उन्होंने खुद जनसमस्याओं के हल के लिए जूझने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि मैंने जिले की तहसील जलेसर क्षेत्र में 30 किलोमीटर के दायरे में खारी पानी क्षेत्र होने के कारण किसानों के पानी के लिए संघर्ष शुरू किया. किसान पानी पीने तक को परेशान था और क्षेत्रीय किसान सिंचाई को लेकर भी काफी परेशान थे. सिंचाई को लेकर इस दयाराम पागल ने 1983 से 1986 तक सिंचाई की माँग को करने के लिए 29 बार एटा के जिलाधिकारी से मिले फिर भी कामयाबी नहीं मिली, तो फिर दयाराम पागल लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष बलराम जाखड़ के पास जा पहुंचे और उन्होंने शासन से प्रशासन को बनाने की अनुमति दी इसके बाद सिंचाई के लिए नहर का रेजूआ,व बम्बा निर्माण हो गया तो किसानों ने राहत की सांस ली. जिससे उनकी खेती आज तक ठीक से हो रही है.

वहीं फिर किसानों की समस्याओं को लेकर दयाराम पागल और चौधरी देवाराम अनशन पर बैठे और 84 दिन तक अनशन पर खाली पेट बैठे. जिसने फिर जनता को हक दिलाया, और वही इनके परिवार की बात करें तो घर में पत्नी और बेटी, बेटों और परिवारीजनों की उन्होंने कभी भी कोई परवाह नहीं की, और ना ही परिवार से कोई लगाव है, वह तो गांधी जी की तरह निस्वार्थ लोगों की समस्याओं को अपनी लड़ाई मानकर लड़ते हैं.

जलेसर तहसील क्षेत्र के नगला मीरा में खारे पानी को लेकर पानी पीने तक को तरस रहे लोगों के कारण मैंने स्वयं उन्नीस सौ स्थानों पर खारे पानी की वजह से जगह,जगह मीठा पानी ढूँढने के लिए अपने हाथों से बोरिंग कराई. मीठा पानी मिलने के बाद गाँव के लिए पानी की टंकी बनवाने के लिए जिला प्रशासन से लेकर राजधानी लखनऊ तक संघर्ष किया. जहां शासन ने उन्हें पानी की टँकी को मंजूर कर बनवा दिया जिससे क्षेत्रीय स्थानीय लोग दयाराम पागल बाबा का गुणगान करते नजर आ जायेंगे.

महात्मा गांधी के अंदाज में सिंचाई संसाधन पेयजल व्यवस्थाओं स्वास्थ, सड़क और सरकारी जमीनों पर कब्जों को हटाने के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं. दयाराम का सत्याग्रह ही दयाराम पागल की ताकत है. वह कहते हैं कि मेरे अनशन करने से लोगों को न्याय मिलता है तो में समाज के लिए आजीवन यह करता रहूंगा. जबकि भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर कई बार वह अपनी आवाज उठा चुके हैं. इसके अलावा 3 बार वह अन्ना हजारे के साथ भी अनशन कर चुके हैं.

कुर्सी वाले  इन अधिकारी और नेताओं के आश्वासनों से उन्हें मिले धोखों से उन्हें अंदर से इन अधिकारियों की कुर्सी से नफरत हो गई और उन्होंने कुर्सी पर बैठना बन्द कर दिया. आज के युग में जहां कुर्सी की लड़ाई  चल रही है वहीं उन्होंने 2 मार्च 1990 से कुर्सी को त्याग दिया है. बैठने के लिए वह जमीन का प्रयोग करते हैं, और लोगों की जन समस्याओं के लिए वह एटा  से अलीगढ़,आगरा, लखनऊ, दिल्ली तक कई बार लड़ाई और अनशन कर चुके हैं.


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