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आख़री लम्हों तक संगीत का ज्ञान बांटती रहीं गिरिजा देवी

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Oct 26 2017 3:15PM
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वाराणसी. धर्म और संस्कृति की राजधानी काशी को दुनिया भर में संगीत घरानों के लिए भी जाना जाता है. इन संगीत घरानों से एक से बड़ कर एक दिग्गज हुए. उन्हीं में एक  बनारस घराने की शान और प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय गायिका गिरजा देवी 'अप्पा' का मंगलवार को कोलकाता में हार्ट अटैक से निधन हो गया. 'अप्पा' को मंगलवार की सुबह इस अस्पताल में दाखिल कराया गया था. 88 साल की उम्र में गिरिजा देवा ने कोलकाता के बीएम बिरला अस्पताल में आखिरी सांस ली.

शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत व ठुमरी गायन को परिष्कृत करने तथा इसे लोकप्रिय बनाने में 'अप्पा' का बहुत बड़ा योगदान रहा. बनारस में जैसे ही इस बात की खबर लोगों तक पहुंची. पूरा शहर गमगीन हो उठा. बताया जा रहा है कि गिरिजा देवी के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए वाराणसी लाया जा सकता है. खबर मिलते ही बनारस से उनके कई परिजन कोलकाता के लिए रवाना हो गये.

गिरिजा देवी को मिले सम्मान

गिरिजा देवी 'अप्पा' को 1989 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण व 2016 पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था. उन्हें 1972 में  पद्मश्री, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1989 में पद्मभूषण, 2010  में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, 2012 में महा संगीत सम्मान अवार्ड मिला.

गिरिजा देवी को ठुमरी की रानी कहा जाता है. शास्त्रीय संगीत से उनका गहरा नाता है. उनकी गाई कई ठुमरी लोगों की जुबान पर रहती है. गिरिजा देवी के निधन के बाद उनकी शिष्या ने बातचीत में कहा कि एक कर्मयोगी चलीं गईं. हम सब के सिर पर जो छाया थी, वही उठ गई. गिरिजा देवी जैसी कलाकार युगों में जन्म लेती हैं. उन्होंने संगीत के लिए ही पूरा जीवन समर्पित कर दिया. अंतिम क्षण तक वह संगीत विद्या का दान ही करती रहीं और गाते बजाते ही दुनिया को छोड़ गईं.

वह सही अर्थों में कर्मयोगी थीं. यह उनका कर्मयोग ही है कि विधाता ने उन्हें कोई कष्ट नहीं दिया. साथ ही उन्होंने भी किसी को न कष्ट दिया न किसी से सेवा ही ली. अब असल में संगीत घराने का आईकॉन चला गया. अक्सर यह कहा जाता है कि संगीतज्ञ अपनी विद्या शिष्यों में नहीं बांटते पर गिरिजा देवी की लंबी शिष्य परंपरा है. उन्होंने अपनी विद्या खूब बांटी. इन दिनों वह कोलकाता में संगीत रिसर्ट एकेडमी में संगीत बनारस घराने के संगीत की शिक्षा दे रही थी.

उन्होंने कहा कि गिरिजा देवी के निधन से बनारस के संगीत घराने की परंपरा की आखिरी कड़ी भी टूट गई. वह सभी से एकदम अलग थीं. जो भी उनसे मिला वह उन्हीं का हो कर रह गया. छन्नु लाल मिश्र ने बताया कि गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को वाराणसी में हुआ था. उनके पिता रामदेव राय एक ज़मींदार थे, जो संगीत प्रेमी थे. पांच वर्ष की उम्र में गिरिजा देवी के लिए संगीत की शिक्षा की व्यवस्था कर दी गई थी. गिरिजा देवी के पहले संगीत गुरु पंडित सरजू महाराज थे. नौ साल की उम्र में पंडित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की. फिल्म में भी किया काम गिरिजा देवी ने कम उम्र में ही हिंदी मूवी याद रहे में काम किया था. गिरिजा देवी के निधन के बाद देश ने शास्त्रीय संगीत की विरासत को खो दिया है. 


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