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तीन तलाक भारत छोड़ो!

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Sep 19 2018 6:56PM
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राजेंद्र कुमार  

एक झटके में तीन बार बोलकर या लिखकर तलाक देने की प्रथा (तलाक-ए-बिद्दत) को मोदी सरकार ने अब भारत से बाहर करने का मन बना लिया है. 22 मुस्लिम देशों में तीन तलाक की प्रक्रिया को प्रतिबंधित किया जा चुका है, परन्तु भारत जैसे एक धर्मनिरपेक्ष देश में यह प्रक्रिया आज तक जारी है. जबकि एक झटके में तीन बार बोलकर या लिखकर तलाक देने की प्रथा (तलाक-ए-बिद्दत) सुप्रीम कोर्ट द्वारा गैरकानूनी करार दी जा चुकी है.

इस फैसले की प्रक्रिया में ही अदालत ने केन्द्र सरकार को इस संबंध में कानून बनाने के लिए भी कहा था, जिसके बाद मोदी सरकार मुस्लिम वुमन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज) बिल, 2017 लायी थी. परन्तु इस बिल को संसद से पारित नहीं करवाया जा सका. राज्यसभा में यह बिल अटक गया क्योंकि विपक्षी दल बिल के कई प्राविधानों से संतुष्ट नहीं थे. 

जिसके बाद केन्द्र सरकार ने इस बिल को लेकर विपक्षी दलों के विरोध को देखते हुए बिल में कई संशोधन कर उसे राज्य सभा से पारित कराने का फैसला किया. फिर भी मुस्लिम संगठनों के इस संशोधित बिल को भी बेकार बताने पर देश के प्रमुख विपक्षी दल इसके पक्ष में नहीं दिखे और यह बिल फिर राज्यसभा से पारित नहीं हो सका. जिसके बाद आज केन्द्र सरकार ने तीन तलाक बिल को पास कराने के लिए अध्यादेश का रास्ता अख्तियार किया.

अब देखना यह है कि मुस्लिम संगठन केन्द्र सरकार के इस फैसले पर क्या रुख अपनाते हैं, क्योंकि मुस्लिम संगठनों के रुख पर छह माह बाद इस बिल पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अपने रुख को तय करेंगे. फिलहाल बीजेपी नेताओं का कहना है कि केन्द्र की मोदी सरकार अब तीन तलाक की कुप्रथा को भारत से बाहर करने की मुहिम में जुट गई है और तीन तलाक की कुप्रथा को भारत से बाहर करके ही चैन लेगी.

वहीं दूसरी तरफ आज भी कई मुस्लिम धर्मगुरुओं ने तीन तलाक बिल को पास कराने के लिए केन्द्र सरकार के लाए गए अध्यादेश का विरोध किया है. जिसको देखते हुए यह लगता है कि तलाक-ए-बिद्दत जैसे सदियों से चले आ रहे चलन की सामाजिक मान्यता इतनी जल्दी खत्म नहीं होगी. कानून कुछ भी कहे, अगर किसी महिला को उसका शौहर तीन बार तलाक कह देता है तो उसकी हैसियत परित्यक्ता जैसी ही हो जाती है. कानून का संरक्षण इस विपत्ति से उबरने में उसकी मदद कर सकता है. इसके अलावा ऐसा करने वाले शौहरों के मन में कानून का खौफ पैदा होगा, जिससे वे गुस्से की हालत में भी अपनी जुबान पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे. ऐसे में समाज का सहयोग महिला को चाहिए होगा. सरकार तथा समाज को भी इस दिशा में भी पहल करनी होगी. सिर्फ सरकार इस मामले में अध्यादेश लाने भर से यह समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी. इसके लिए सभी विपक्षी दलों और मुस्लिम धर्मगुरुओं का सहमत होना भी जरूरी है. यह सहमति अभी दिख नहीं रही है. ऐसे में छह माह बाद केन्द्र सरकार इस अध्यादेश को दोनों सदनों से पारित करा पाती है या नहीं? यह अभी नहीं कहा जा सकता.

विपक्षी दलों और मुस्लिम धर्मगुरुओं का कहना है कि सरकार ने मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड सहित विपक्षी दलों से इस मामले में बिल तैयार करते हुए सुझाव नहीं लिए, और इन लोगों ने लोकसभा तथा राज्यसभा में बिल को लेकर जो सुझाव दिए उन्हें भी शामिल करने पर गंभीरता से विचार नहीं किया. सरकार आनन-फानन में सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद बिल लाकर यह जताने का प्रयास करती रही है कि उसने ही देश में मुस्लिम महिलाओं को तलाक के भय से निकालने की पहल की है. पर ये दावा करते हुए यह नहीं देखा कि कितना लचर कानून वह इस बाबत ला रही है, जिसे लेकर मुस्लिम समाज के धर्मगुरू सहमत नहीं हैं.

इसके बाद से ही तीन तलाक पर अंकुश लगाने को लेकर केन्द्र सरकार के हर प्रयास को लेकर देश में राजनीति होती रही है. आज भी वह जारी है. बीजेपी तथा अन्य दल भी इस मामले में राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं. कहा जा रहा है कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी तीन तलाक को मुद्दा बना कर मुस्लिम महिलाओँ में अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उसे इसका फायदा मिलने की बात भी कही जा रही है. विपक्षी दलों का कहना है कि 2019 के चुनाव से पहले पार्टी हर उस संभावना को टटोल रही है. जिससे उसकी सत्ता बनी रहे. जबकि केन्द्र सरकार का दावा है कि उसकी कोशिश तीन तलाक को "पूरी तरह से प्रतिबंधित" करने की है. उसी सोच के तहत आज अध्यादेश लाने का फैसला किया गया है.

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं)


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