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कौसानी से जुड़ी हैं बापू की बहुत सी यादें

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Oct 2 2018 7:05PM
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बागेश्वर. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की यादें पर्यटन स्थली कौसानी से भी जुड़ी हैं. 1929 में वह यहां आए थे. कुछ पल की थकान मिटाने के लिए वह कौसानी में ठहरे लेकिन यहां की खूबसूरती ने उन्हें इतना मोहित किया कि उन्होंने पूरे 14 दिन यहां गुजारे.

कौसानी का अनासक्ति आश्रम बापू की प्रवास स्थली बना. जहां आज भी बापू से संबंधित दस्तावेज सुरक्षित हैं. यहीं उन्होंने गीता पर आधारित अपनी योग पुस्तक अनसक्ति योग की प्रस्तावना पेश की थी. यहां बिताए 14 दिनों के दौरान उन्होंने इसका पहला चरण भी पूरा किया. आज भी देश व विदेश से आने वाले सैकड़ों सैलानी यहां उनकी याद में संजोकर रखी गई वस्तुओं का दीदार करते हैं.

कौसानी उत्तराखंड का सबसे खूबसूरत स्थान है. इस बात को महात्मा गांधी के यहां के प्रति प्रेम को देखते हुए बल मिलता है. उन्होंने इसकी अगाध सुंदरता को देखते हुए इसे भारत का स्विटजरलैंड नाम दिया था. उनकी प्रवास स्थली अनासक्ति आश्रम में आज भी सुबह और शाम प्रार्थना होती है. बापू की प्रिय रामधुन बजाई जाती है. यहां गांधी जी के वंशजों की जानकारी मिलती है. यहां मौजूद पुस्तकों व अन्य दस्तावेज से गांधी जी के विचारों को आसानी से समझा जा सकता है. आश्रम से प्रकृति की खूबसूरती का भी दीदार होता है. यहां से हिमालय की लंबी पर्वतश्रृंखला को देखा जा सकता है. जिसके कारण यहां भारी संख्या में टूरिस्ट भी आते हैं.

आश्रम की देखरेख करने वाले सैलानियों को गांधी प्रवास के बारे में विस्तार से बताते हैं. जिससे लोगों को बापू के जीवन को जानने में बहुत मदद मिलती है. हालांकि आश्रम की देखरेख की समुचित व्यवस्था का प्रबंध नहीं होने से इसकी हालत बहुत अच्छी नहीं है. इस धरोहर को संरक्षित व सुरक्षित रखने के लिए बेहतर सुविधाएं देने की जरुरत है. ताकि लोगों को बापू के जीवन के बारे में और अधिक जानने और कौसानी से जुड़ी उनकी यादों को आत्मसात करने का मौका मिल सके.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बागेश्वर से गहरा नाता रहा है. 22 जून 1929 को बापू ने यहां के ऐतिहासिक नुमाइश खेत मैदान में स्वराज भवन की नींव रखी थी. उस वक्त बागेश्वर से बापू के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहन जोशी ने बापू से स्वराज भवन की आधारशिला रखने का अनुरोध किया था. उन्हीं के अनुरोध पर एतिहासिक स्वराज भवन की नींव बापू ने रखी थी.

इसी स्थान पर 30 साल बाद बापू की प्रतिमा लगायी गयी. आज आलम यह है कि यह जगह उदासीनता का शिकार है. जिस जगह पर बापू की प्रतिमा लगी है. उस स्थान को लावारिस छोड़ दिया गया है. 2 अक्तूबर की सुबह चंद लोग बापू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर खानापूर्ति जरूर करते हैं. बापू की प्रतिमा के आसपास चबूतरा बनाया गया है. जो जगह जगह से क्षतिग्रस्त हो गया है. जिला प्रशासन और नगर पालिका की लापरवाही पर लोग नाराज भी हैं, लेकिन जिम्मेदारों के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है.

22 जून 1929 कालखंड के लोग भले ही आज जिंदा ना हों लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाये जाने वाले किस्से आज भी लोगों के दिलो दिमाग में ताजा हैं. लोगों के जेहन में याद है जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पूरे देश में स्वतंत्रता की अलख जगा रहे थे. पूरे देश में भ्रमण कर वे लेागों को अपने अधिकारों की याद दिला रहे थे और लोगों से कह रहे थे कि वे अंग्रेजों के खिलाफ शोषण के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करें. ये वही दौर था जब लोगों ने गांधी जी की एक आवाज पर अपना सर्वश्व बलिदान कर दिया.


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