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साइबर क्राइम का शातिर सरगना यूसुफ अरेस्ट

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Nov 5 2018 1:12PM
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गोरखपुर. पुलिस ने साइबर क्राइम के शातिर गैंग का पर्दाफाश किया है. पुलिस ने गैंग सरगना यूसुफ खां समेत तीन शातिर बदमाशों को गिरफ्तार किया है. जबकि गैंग के दो सक्रिय सदस्य फरार हुये हैं. गिरफ्त में आये जाससाजों के पास से 4.80 लाख नगदी, मोबाइल और आधार कार्ड बरामद किया गया है.

कोतवाली पुलिस ने एडी तिराहे के पास से शातिर बदमाशों को गिरफ्तार किया है. दरअसल पुलिस ने मेडिकल कालेज के डॉ. अजहर अली और उनके पिता डॉ. शौकत अली खान के संयुक्त खाते से 10 लाख रुपये निकाले जाने के फ्राड का खुलासा किया है. दिलचस्प है कि जालसाजों ने गोरखपुर और कानपुर में दो फर्जी खाता खुलवाकर यह रकम उड़ाई थी. इस मामले में पुलिस ने तीन जालसाजों मो. यूसुफ खां, शमसुद्दीन अहमद और अमितेष सिंह उर्फ निक्कू को गिरफ्तार किया है.

मामले का खुलासा करते हुये एसएसपी शलभ माथुर ने बताया कि रवि सोलंकी और रत्नाकर सिंह भी इस घटना में शामिल थे. अभी उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है. एसएसपी के मुताबिक डाक्टर पिता-पुत्र का संयुक्त खाता भारतीय स्टेट बैंक की उर्दू बाजार शाखा में है. डॉ. शौकत ने एक साल पहले एटीएम कार्ड के लिए आवेदन किया था. इस दौरान डाकिये की गलती से एटीएम कार्ड उनके घर के बगल में रहने वाले मो. यूसुफ खां को मिल गया. इसके बाद से ही यूसुफ ने डाक्टर के खाते से रकम निकालने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था. इससे पहले यूसुफ हत्या के एक मामले में जेल गया था. जेल में उसकी मुलाकात बशारतपुर, शाहपुर के रहने वाले रवि सोलंकी से हुई थी. रवि सोलंकी के साथ मिलकर उसने फ्राड करने की योजना तैयार की. बाद में अमितेष और शमसुद्दीन के साथ मिलकर इस योजना पर काम करना शुरू किया. करीब एक साल तक इंतजार करने के बाद खाते में 10 लाख रुपये आने के बाद खाते से रकम निकाल ली.

गौरतलब है कि जालसाजों ने योजना को अंजाम देने के लिए सूरजकुंड शाखा के कर्मचारी मंसूर खां से मिलकर खाते व खाते से जुड़े मोबाइल नंबर का पता लगाया. बाद में मोबाइल की गुमशुदगी दर्ज कराकर उस नंबर को बंद करा दिया. खाते से दूसरा मोबाइल नंबर जुड़वाकर इंटरनेट बैंकिंग शुरू करा दी. इसके बाद वे खाते में रकम आने का इंतजार करते रहे. करीब दो माह पहले 10 लाख रुपये खाते में आने पर उन्होंने रकम निकाल ली. एसएसपी ने बताया कि इस पूरे मामले में डाक्टर के खाते की डिटेल बताने वाले और फर्जी नाम व पते पर खाता खोलने वाले बैंक कर्मियों की भूमिका सवालों के घेरे में है. उनकी भूमिका की भी जांच होगी.

वहीं रकम निकालने के लिए जालसाजों ने कानपुर में भारतीय स्टेट बैंक तथा गोरखपुर में इलाहाबाद बैंक में दो फर्जी खाते खुलवा रखे थे. इंटरनेट बैंकिंग की मदद से उन्होंने डाक्टर के खाते से पूरी रकम कानपुर वाले खाते में भेज दी. बाद में कानपुर वाले खाते से रकम गोरखपुर स्थित इलाहाबाद बैंक के खाते में ट्रांसफर की. इलाहाबाद बैंक से 8.50 लाख रुपये का एक इलेक्ट्रानिक्स फर्म के नाम से डिमांड ड्राफ्ट बनवाया. फर्म के संचालक को पांच प्रतिशत कमीशन देकर उन्होंने बाकी रकम खुद ले ली. खाते में बचे शेष 1.50 लाख रुपये उन्होंने नकद निकाला था.


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