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सहयोगी संगठनों से परेशान है बीजेपी

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Dec 29 2018 6:22PM
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लखनऊ. लोकसभा चुनाव की तैयारी में सभी दल लग गए हैं, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में बीजेपी के सहयोगी दल बीजेपी के लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं. महाराष्ट्र से लेकर यूपी बिहार में बीजेपी को अपने सहयोगियों से नाराजगी झेलना पड़ रही है.

भारतीय जनता पार्टी तीन प्रदेशों में चुनाव क्या हारी उसके अपने ही बेगाने हो गए और उसका असर अब धीरे-धीरे दिखाई दे रहा है. ताजा मामला उत्तर प्रदेश का है, जहां उसके सहयोगी दलों द्वारा बीजेपी के सामने चुनौती खड़ी की जा रही है. पहले भासपा अब अपना दल.

बीजेपी के सहयोगी अपना दल (S) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया कुछ इसी तर्ज पर भाजपा के खिलाफ हमलावर हैं. वक्त भी सटीक है, लोकसभा चुनाव सिर पर हैं. इन तीखे तेवरों को भाजपा भले ही सौदेबाजी की सियासत कहे लेकिन दोनों दलों की इस तल्खी के पीछे अपनी-अपनी चाहतें हैं, और शिकवे भी हैं, जो लम्बे सियासी सफर के बावजूद बरकरार हैं. वैसे असल वजह लोकसभा चुनावों में सीटों पर ज्यादा दावेदारी मानी जा रही है.

अपना दल (एस) के नौ विधायक हैं और दो सांसद. अपना दल के कोटे से प्रदेश की भाजपा सरकार में एक ही राज्यमंत्री हैं, जय कुमार सिंह 'जैकी'. सूत्र बताते हैं कि बहुमत आने के बाद सरकार बनी तो तय हुआ कि अपना दल के अध्यक्ष आशीष पटेल को मंत्रिमंडल में लिया जाएगा. उन्हें एमएलसी भी बनाया गया. मंत्रिमंडल विस्तार में देरी के कारण यह वादा पूरा नहीं हो पाया है. नाराज़गी का एक कारण यह भी है.

एनडीए में पड़ी दरार पर सपा चुटकी भी ले रही है. सपा के प्रवक्ता का कहना है कि नाव डूब रही है. डूबती नाव पर कौन यात्रा करना चाहता है. वहीं भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हीरो वाजपेयी का कहना है कि नाराजगी कोई नहीं है. विकास के मुद्दे पर हम लोग 2019 में लोगों के बीच जाएंगे और लोगों का जनादेश हमारे पक्ष में आएगा.

अपना दल और भाजपा के संगठन स्तर पर भी बेहतर तालमेल नहीं है. मसलन, कहीं जिला संगठन से दिक्कतें हैं तो कहीं विधायकों में सामंजस्य नहीं है. इसे नजरअंदाज भी कर दिया जाए तो शिकवे और भी हैं. अपना दल को शिकायत रहती है कि अधिकारी चाहे पुलिस अधीक्षक हों या फिर डीएम, अपना दल के पदाधिकारियों की सिफारिशें नहीं सुनी जा रही हैं. आयोगों में होने वाली तैनातियों में भी अपना दल की मांग पर ध्यान नहीं दिया गया. लखनऊ में कार्यालय की मांग पूरी नहीं हुई. बमुश्किल एक बंगला आशीष पटेल को दिया गया. एक शिकवा यह भी है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल में अनुप्रिया पटेल को राज्यमंत्री का दर्जा मिला है लेकिन विभाग में उन्हें कोई महत्वपूर्ण काम नहीं दिया गया. यही नहीं इस नाराजगी के पीछे ज्यादा और मनमाफिक सीटों पर दावेदारी के लिए दांवपेच भी माना जा रहा है.


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