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ओडीएफ घोषित जिले में खुले में शौच को जा रही हैं महिलायें

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Nov 9 2018 5:03PM
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ललितपुर. सरकार भले ही खुले में शौच को खत्म करने की लाख कोशिश कर रही हो, लेकिन ऊंची कुर्सी पर बैठे अफसर इस कोशिश को पलीता लगा रहे हैं. ताजा मामला ललितपुर से है, जहां शासन के लगातार दबाव के कारण बुन्देलखण्ड का ललितपुर भले ही ओडीएफ घोषित कर दिया गया हो लेकिन यहां कि जमीनी सच्चाई कुछ और ही है.

जिले के विकास खण्ड वार, बिरधा, जखौरा, मडावरा, महरौनी और तालबेहट में बनाए गये शौचालय के बर्षवार कुछ आंकड़े देखे जाएँ तो जनपद में वर्ष 2014-15 में 4956 शौचालय, वर्ष 2015-16 में 4504 शौचालय, वर्ष 2016-17 में 12513 शौचालय, वर्ष 2017-18 में 49467 शौचालय और वर्ष 2018-19 में 45093 शौचालय बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. इस लक्ष्य के बावजूद ग्रामीण अंचलों में हाथ में लोटा लेकर जाती महिलाएं अपनी आदत से खुले में शौच करने नहीं जा रही हैं बल्कि यह वह महिलायें हैं जिनको ग्रामीण स्तर पर ग्राम प्रधानों से लेकर जिला प्रशासन द्वारा भी इन महिलाओं को बर्षो से सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का महज आश्वासन भर ही दिया गया है. जिससे यह महिलाएं शासन की योजनाओं का लाभ लेने में असमर्थ ही रहीं, मजबूरन सरकार के तमाम दावों और स्वच्छ भारत अभियान को मुह चिढ़ाती यह महिलाएं खुले में शौच को मजबूर हैं.

शर्मनाक बात तो यह है कि शासन के दवाव के कारण जिला प्रशासन ने जनपद भर के गांव में वित्तीय वर्ष 2017-18 में 583,524,000 (अट्ठावन करोड़ पैंतीस लाख चार हजार) करोड़ रूपये एवं वित्तीय वर्ष 2018-2019 में 306,576,000 (तीस करोड़ पैंसठ लाख छहत्तर हजार रुपयेएवं दोनों वित्तीय बर्ष 17-18 व 18-19 को मिलाकर जिला प्रशासन ने 890,100,000 (नवासी करोड़ एक लाख रुपये का भारी भरकम बजट खर्च कर कागजों में जिले को ओडीएफ़ कर दिया.

जबकि हकीकत यह है कि शासन से ग्रामीण स्तर तक भेजे गए इस भारी भरकम बजट में जमकर घालमेल हुआ और जमीनी स्तर पर पात्र लाभार्थी अपने घर मे शौचालय से वंचित होकर खुले में शौच जाने को मजबूर हैं. सरकार में नम्बर पाने के लिये जिला प्रशासन ने जनपद को भले ही ओडीएफ कर डाला हो, लेकिन जमीनी हकीकत यही है ग्रामीण स्तर पर आज भी महिलाएं गांव में खुले में शौच को मजबूर हैं. महिलाएं लगातार ग्राम प्रधानों से घर में शौचालय की मांग कर रही हैं लेकिन ग्रामीण स्तर पर लोगों से भेदभाव और भ्रष्टाचार के कारण पात्रों को इसका लाभ नहीं मिल सका.

नेशनल वॉयस कि टीम जब ललितपुर के गांवों का जायजा लेकर मुख्यालय पर सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल की तो पता चला कि जिला प्रशासन ने अपने हुनर का इस्तेमाल सरकारी दस्तावेजों पर भ्रष्टाचार की स्याही से इस कदर किया है, कि सरकार और सरकार के हुक्मरान भी जिला प्रशासन की पीठ थपथपाने दिल्ली और लखनऊ से ललितपुर तक चल के आ जाए. जबकि ग्राउण्ड जीरो कि रिपोर्ट बताती है कि जनपद के ग्रामीण स्तर पर आज लोगों के घरों में शौचालय नहीं है.

ग्राम प्रधान ग्राम पंचायत सचिव और विकास खण्ड अधिकारियों ने इस योजना में इस कदर लूट मचाई कि अपात्रों से अवैध बसूली कर एक की जगह दो और दो के स्थान पर चार चार शौचालयों की सौगात दे दी लेकिन पात्रता की श्रेणी में आने वाले गरीब अपने घरों में महज इसलिये शौचालय नहीं बनवा सके कि वह प्रधान और पंचायत सचिव को सन्तुष्ट नहीं कर सके.

वहीं कई गांव में शौचालय बने भी हैं तो प्रधान ने ठेकेदारी प्रथा लागू कर दी और ठेकेदार ने शौचालयों को ऐसा रूप दिया कि वह बनने के बाद से आज तक प्रयोग में ही नहीं लाये जा सके. जब हमने ग्रामीण महिलाओं और पुरूषों से बात कि तो कई महिलाओं ने कहा कि प्रधान उनका शौचालय इसलिये नहीं बनवाए हैं कि वह उनको वोट नहीं दिये थे, कुछ ने कहा कि प्रधान पैसा भी ले गया लेकिन अभी शौचालय नहीं बनवाया. कुछ महिलायें कहती हैं कि प्रधान पहले खुद का विकास कर लें फिर दूसरों का करेगा, लेकिन दिलचस्प है कि ग्रामीणों द्वारा जिला मुख्यालय पर आकर गांव में सरकारी योजनओं का लाभ मांगते हैं फिर भी गांव में व्यवस्था जस कि तस बनी हुई है.

वहीं इस मामले पर जिलाधिकारी मानवेन्द्र सिंह ने बताया है कि उन्होने ललितपुर को 28 सितम्बर को ओडीएफ घोषित किया है. कुछ कमी है जिसके लिये तीन माह का समय है जो जल्द से जल्द पूरी भी कर ली जाएगी. जिलाधिकारी महोदय बताते हैं कि 2011 के सर्वे के अनुसार सभी लोगों के शौचालय बन गये, लेकिन उसके बाद कई परिवार गांव अलग हुये है जिनका शासन के निर्देश पर फिर से सर्वे किया जा रहा है, और उन सभी लोगों की सूची तैयार कर उनके शौचालय बनाए जाने हैं.


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