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हाशिए पर पहुंचे केजरीवाल?

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: May 29 2019 7:13PM
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राजेन्द्र कुमार

इस बार का जनादेश एक बार फिर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खिलाफ गया है. कांग्रेस का जहां देश के 21 राज्यों में सफाया हो गया है. वहीं आम आदमी पार्टी दिल्ली में एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी. अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में ये पार्टी 40 सीटों पर चुनाव लड़ी पर उसे कामयाबी मात्र एक सीट पर ही पंजाब में मिली. बात साफ है कि अरविंद केजरीवाल भले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं, पर देश के मतदाता उन्हें और उनकी राजनीति को स्वीकार करने को  तैयार नहीं हैं. इस लोकसभा चुनाव में उनके दल के खिलाफ जो जनादेश आया है वह अरविद केजरीवाल के लिए खतरे की घंटी है. अब यदि उन्होंने इस जनादेश का संज्ञान लेकर अपने रवैये में बदलाव नहीं किया तो उनके लिए आगे की डगर कठिन ही रहेगी.

चंद वर्ष पहले देश की राजनीति में अरविंद केजरीवाल धूमकेतु की तरह उभरे थे. देश की राजनीति को बदलने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल ने ही दिल्ली में पीएम मोदी को हार का सबक सिखाया था. उसी दिल्ली ने बीते लोकसभा चुनाव में अब अरविंद केजरीवाल को झटका दिया है. इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी 40 सीटों पर लड़ी, मगर उसे कामयाबी सिर्फ़ एक सीट पर मिली. यही नहीं, दिल्ली में जहाँ कि उसी की पार्टी की सरकार है, वहाँ भी पार्टी को सभी सात सीटों पर हार का मुँह देखना पड़ा, और वोट प्रतिशत के लिहाज़ से भी ये पार्टी बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर पहुंच गई. जबकि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में इसी पार्टी को पंजाब की चार सीटों पर जीत हासिल  हुई थी. अब लोकसभा चुनाव में इतने खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के अंदर और बाहर सभी ओर से पार्टी के नेतृत्व पर सवाल उठाए जा रहे हैं. चांदनी चौक की विधायक अलका लांबा ने तो चुनावी नतीजे सामने आने के तुरंत बाद पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया. तो पार्टी में अरविंद केजरीवाल की तानाशाही से खफा लोगों को ताकत मिल गई और पार्टी के कई पूर्व सहयोगियों ने पंजाब से लेकर दिल्ली तक आम आदमी पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के लिए अरविंद केजरीवाल को ज़िम्मेदार ठहराया.  

केजरीवाल से खफा अलका लांबा ने तो चुनावी नतीज़े आने के बाद पार्टी द्वारा शुरू किये गए एक नये चुनावी कैंपेन पर निशाना साधा. पार्टी के नये कैंपेन के तहत शहर में कई जगह 'दिल्ली में तो केजरीवाल' के बोर्ड लगाए गए थे. अलका लांबा ने इस चुनाव अभियान पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि इस बार दिल्ली में मोदी की तरह किसी एक नाम पर वोट नहीं मिलेंगे. वह कहती हैं कि वर्ष 2014 के आम चुनाव से पहले आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी तमाम लोकतांत्रिक सवालों को उठाते हुए सत्ता में आई थी, लेकिन 2020 में आम आदमी पार्टी केजरीवाल के नाम पर वोट मांगने के लिए निकली, और जनता ने उसे ठुकरा दिया. जनता की नाराजगी का अहसास अरविंद केजरीवाल और उनके रणनीतिकारों को भी था, पर उन्होंने दिल्ली से लेकर पंजाब तक पार्टी से नाराज लोगों को मनाने का प्रयास ही नहीं किया. ये लोग पहले कांग्रेस पर चुनावी गठबंधन करने के लिए दबाव बनाते रहे. जब इसमें नाकामयाब हुए तो कांग्रेस पर आरोप लगाने लगे. तो जनता में केजरीवाल के लिए वह सम्मान जो अन्ना आंदोलन के बाद बना था, अब तकरीबन खत्म हो गया, और दिल्ली से लेकर पंजाब तक ये संदेश चला गया कि इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपना जलवा खो चुकी है. इसका नतीजा ये हुआ कि दिल्ली में आटो वालों ने केजरीवाल की जय-जयकार नहीं की. आम आदमी पार्टी के पोस्टर अपने ऑटो पर नहीं लगाये.

लोगों की नाराजगी का परिणाम ही है कि दिल्ली की गद्दी पर काबिज अरविंद केजरीवाल खुद अपनी विधानसभा सीट पर हार कर तीसरे नंबर पर पहुँच गए. आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर मिले मतों का अगर विश्लेषण किया जाये तो पायेंगे कि दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से बीजेपी 65 सीट जीत सकती और कांग्रेस 5 सीटें, जबकि आम आदमी पार्टी का खाता भी नहीं खुलेगा. इन आंकड़ों के अनुसार बीजेपी दिल्ली में जहां 65 सीटों पर आगे थी, वहीं वह 5 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. जबकि कांग्रेस 5 सीट आगे रही और 42 सीटों पर दूसरे नंबर पर और 23 सीटों पर तीसरे नंबर पर रही. इसके विपरीत बीते विधानसभा में 67 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत रही है जबकि 23 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर है, और 47 सीटों पर तीसरे नंबर पर. पंजाब में भी केजरीवाल की हालत खराब है. पंजाब में मतदाताओं के मोहभंग होने के लिए अरविंद केजरीवाल से ज़्यादा उनके सहयोगी ज़िम्मेदार हैं. 

लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को मिली करारी हार की केजरीवाल और उनकी टीम को समीक्षा करनी होगी. दिल्ली में आम आदमी पार्टी का सूपडा क्यों साफ़ हुआ? इसका आंकलन करना होगा. अब आम आदमी पार्टी को आत्ममंथन करने की जरूरत है कि पार्टी को कैसे बचाया जाए क्योंकि उसके पास राज्य सभा में तीन और लोकसभा में सिर्फ एक सांसद है. अब इस दलील से काम नहीं चलेगा कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अलग अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं. और जैसा करिश्मा केजरीवाल ने पहले किया था, वैसे वो फिर कर गुजरेंगे. आम आदमी पार्टी वर्ष  2014 में एक भी लोकसभा की सीट नहीं जीत सकी थी पर उसने 2015 के  विधानसभा चुनाव में दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटें जीती थीं. केजरीवाल समर्थक कहते हैं कि मुहल्ला क्लीनिक और सरकारी स्कूलों के कायाकल्प करने जैसे कामों के कारण जनता उन्हें फिर दिल्ली की गद्दी पर बिठायेगी. 

मगर मौजूदा लोकसभा चुनाव के आंकड़ें भी काफी कुछ इशारा कर रहे हैं. इनके अनुसार दिल्ली के मुस्लिम समाज ने सीलमपुर, बाबरपुर, मुस्तफाबाद, बल्लीमारान, मटियामहल, चांदनी चौक और ओखला जैसे विधानसभा में कांग्रेस को नंबर दो की पार्टी बना दिया और आप इन क्षेत्र में तीसरे नंबर पर पहुँच गयी है. आम आदमी पार्टी के लिए ये संकट काफी गहरा है. राहत की बात ये है कि आप के पास अभी कुछ महीनों का वक्त है जिससे वो अपनी हालत सुधार सकता है वरना आम आदमी पार्टी धीरे धीरे जिस तरह उभरी थी उसी तरह खत्म हो जाएगी, क्योंकि पंजाब और गोवा में उसका कोई भविष्य नहीं है और न ही हरियाणा में. ऐसे में अब अरविंद केजरीवाल को पार्टी में सबकी सुननी होगी. संगठन में नेताओं को उभरने देना होगा. तानाशाही भरे फैसले लेने से बचना होगा. इसलिए अब अरविंद केजरीवाल जनता की समस्याओं को दूर करने वाली योजनायें शुरु करें तब ही वह बीजेपी और कांग्रेस को चुनौती दे सकेंगे. वरना जनता तो उनसे खफा है ही, दिल्ली से लेकर पंजाब तक लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को हाशिए पर लाकर जनता ने ये संदेश केजरीवाल को दे ही दिया है.

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं)


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