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चुनाव नजदीक तो फिर याद आयी अयोध्या!

Reported by nationalvoice , Edited by avinash , Last Updated: Aug 21 2018 3:36PM
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राजेंद्र कुमार   
(एसोसिएट एडिटर )       
                                                       
पैतीस साल पहले अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर का ताला खुला था। इसी के बाद से यानि बीते पैतीस सालों से देश के किसी राज्य में कोई भी चुनाव रहा हो, बीजेपी अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण का मुददा उठाती रही है। अब फिर बीजेपी को इस मुददे की याद आयी है, क्योंकि अगले साल देश में आम चुनाव होने हैं। अब फिर यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने राममंदिर का मुददा छेड़ा है। उन्होंने ऐलान किया है कि अगर जरूरत पड़ी तो हम राम मंदिर के लिए संसद से कानून पास कर सकते हैं। वह कहते हैं कि अगर उसके पहले हम तीसरे विकल्प पहुंचते हैं तो कांग्रेस का विरोध करेगी, क्योंकि वह कोर्ट में भी हमारा विरोध कर रही है। कांग्रेस संसद में भी हमारा विरोध करेगी। वहां संख्या बल हमारे पास अभी कम है। इसलिए हमारे पास जो तीसरा विकल्प संसद से कानून बनाने का मौजूद है, उस पर हम अमल कर सकते हैं। पर जब दोनों विकल्प यानि अदालत और आमसहमति से जरिए मंदिर निर्माण का हल न निकला, तो हम तीसरे विकल्प पर संसद से राम मंदिर निर्माण कराने की दिशा में बढ़ेंगे।       
    
यह दावा करने वाले यूपी के डिप्टी सीएम यह भलीभांति जानते हैं कि अभी यह मसला  सुप्रीम कोर्ट के पास है। और केंद्र की मोदी सरकार ने बीते चार वर्षो तक इस मामले में कोई पहल नहीं की है। न ही पीएम नरेंद्र मोदी ने इस मामले में कोई बयान ही दिया है। सूबे के सीएम यानि योगी आदित्यनाथ ने जरूर अयोध्या जाकर यह अहसास कराने का प्रयास किया कि अयोध्या के में मंदिर निर्माण को धार्मिक महत्व को जगमगाने के प्रयास वह लगातार करते रहेंगे।
 
इस क्रम में उन्होंने बीती दीपावली में समूची अयोध्या को दीपों से सजवाया था और सरयू के किनारे भगवान राम की एक भव्य प्रतिमा स्थापित करने की संबंधी योजना शुरू कराने का ऐलान करवाया था, पर उन्होंने अयोध्या में भव्य राममंदिर कब बनेगा? इसे लेकर अभी तक अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है, जबकि मुख्यमंत्री बनने के पहले वह दावा करते थे कि जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा। लेकिन अब   योगी आदित्यनाथ ऐसा कोई दावा नहीं करते।         
                                
दूसरी तरफ यूपी के डिप्टी सीएम दावा कर रहे हैं कि अगर जरूरत पड़ी तो हम राम मंदिर के लिए संसद से कानून पास कर सकते हैं। तो उनके इस ऐलान क्या राजनीतिक मायने हैं? केशव प्रसाद मौर्य यह भलीभांति जानते हैं कि अयोध्या में राममंदिर का भव्य निर्माण अब सुप्रीमकोर्ट का फैसला आने के बाद ही संभव है, तब भी उन्होंने राममंदिर निर्माण का मसला छेड़ा है। तो इसका मतलब है कि बीजेपी अब जनता में यह संदेश देना चाहती है कि अयोध्या में राममंदिर निर्माण का मसला उसके एजेंड़े में है। और राज्यसभा में बहुमत न होने के चलते ही केंद्र की हिंदूवादी नरेन्द्र मोदी सरकार इस मामले में विधेयक नहीं ला पा रही है। इसलिए देश की जनता बीजेपी की दिक्कतों को समझे और आगामी चुनावों में एक बार फिर मोदी सरकार को केंद्र सत्ता में लाए। ताकि राज्यसभा में भी मोदी सरकार का बहुमत हो सके और फिर केंद्र सरकार गुजरात के सोमनाथ की तर्ज पर अयोध्या में भी भव्य राममंदिर निर्माण  का रास्ता तैयार कर सके।           
                   
वास्तव में हर चुनाव के पहले अयोध्या में राममंदिर निर्माण, बीजेपी की राजनीति का यह अजमाया हुआ पैतरा है। जिसके जरिए ही बीजेपी ने हिंदू समाज में पैठ जमायी और केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई। उसके बाद देश के कई राज्यों में सरकार बनायी। यूपी में भी रिकार्ड तोड़ बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई। इसके चलते ही इस बार यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार से देश की जनता को यह उम्मीद जगी कि अब अयोध्या में राममंदिर को लेकर कोई सार्थक पहल होगी? परन्तु ऐसा नहीं हुआ। हालांकि योगी आदित्यनाथ सरकार ने लगातार अयोध्या मसले को चर्चा में रखा। वह खुद कई बार अयोध्या गए।
 
राम जन्मभूमि मंदिर का दर्शन किया और अयोध्या को दीपावली में दीपों से सजवाया। यहीं नहीं उन्होंने सबकी सहमति से राममंदिर के निर्माण का रास्ता तलाशने का प्रयास करने वाले श्रीश्री रविशंकर के प्रयासों  को भी सराहा और राममंदिर निर्माण के लिए सियावक्फ बोर्ड की जमीन देने का ऐलान करने वाले वसीम रिजवी को वाईश्रेणी की सुरक्षा तक प्रदान की। और अयोध्या में राममंदिर का निर्माण न कराने को लेकर नाराज हो रहे साधू संतों को भी मुख्यमंत्री ने मनाने का प्रयास किया। ताकि बीजेपी के गले की हड्डी बनता जा रहा अयोध्या का मामला सुलझाया जा सके। परन्तु यूपी सरकार के इतने सारे प्रयास भी नाकाम रहे। और बीजेपी पर लगातार यह आरोप लगते रहे कि पार्टी ने अयोध्या मसले का ठंड़े बस्ते में डाल दिया है।     
 
                                           
बीजेपी के प्रति जनता के इस रूख की जानकारी होने पर बीजेपी नेतृत्व को झटका लगा। जिसके चलते ही अब यूपी के डिप्टी सीएम केशव मौर्य से अयोध्या मसले पर यह बयान दिलवाया गया। ताकि जनता को यह संदेश दिया जा सके कि अयोध्या में भव्य राममंदिर को लेकर क्या-क्या दिक्कतें हैं और क्यों बीजेपी चाह कर भी इस मामले में पहल क्यों नहीं कर पा रही है। परन्तु यूपी के डिप्टी सीएम से अयोध्या में राममंदिर के लिए कानून लाने का बयान दिलवाने वाले बीजेपी के रणनीतिकार यह भूल गए कि डिप्टी सीएम के इस बयान के बाद कई सवाल बीजेपी नेतृत्व से पूछे जाएंगे? जिनका जवाब देना बीजेपी को मुश्किल होगा? और वही हुआ।          
 
आज बीजेपी से पूछा जा रहा कि केंद्र की सरकार ने इस मामले में अब तक पहल क्यों नहीं की। जो सरकार बहुमत न होने पर भी तीन तलाक से लेकर तमाम विधेयक संसद में लाकर पारित करवा सकती है, उस सरकार ने अयोध्या में राममंदिर निर्माण को लेकर अब तक एक भी ठोस पहल क्यों नहीं की। क्यों मुस्लिम धर्मगुरूओं के साथ बातचीत कर अयोध्या में राममंदिर निर्माण को लेकर कोई रास्ता तलाशने का प्रयास नहीं किया गया? जबकि कई पूर्व प्रधानमंत्रियों ने इस तरह की पहल की थी, और उसके परिणाम अच्छे रहे थे। फिर इस तरह की पहल मोदी या योगी सरकार  ने क्यों नहीं की। क्या अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही मोदी और योगी सरकार ने भी मंदिर निर्माण के मसले को ठंड़े बस्ते में डाल दिया है? और जैसे ही चुनाव नजदीक आए इस मामले को लेकर बीजेपी ने अब फिर राजनीति  शुरू कर दी है? और इसी राजनीति के तहत जनता को यह याद दिलाया जाने लगा कि बीजेपी किन वजहों से भव्य राममंदिर निर्माण कराने में असफल रही है। और भव्य राममंदिर निर्माण के लिए बीजेपी को क्या चाहिए। ताकि जनता एक बार फिर उसका साथ दे, जैसे की 2014 में दिया था। 

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