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शिव की नगरी में गूंजे हनुमान के जयकारे

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Apr 19 2019 5:03PM
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वाराणसी. शिव की नगरी शुक्रवार को पूरी तरह से हनुमान मय हो गयी. हर ओर बजरंगबली के जयकारे गूंज रहे थे. इस दौरान निकली भव्य शोभायात्रा ने काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी की पहचान का दर्शन कराया. इस शोभायात्रा में हजारों की संख्या में शामिल हुए श्रद्धालुओं ने हनुमान जयंती का उत्सव धूम-धाम से मनाया. मन और शरीर पर आस्था का ऐसा असर रहा कि झुलसा देने वाली धूप में भी श्रद्धालु नाचते-गाते और जयकारे लगाते आगे बढ़ रहे थे. पिछले 15 दिनों से निकल रही हनुमान ध्वजा प्रभात फेरी के अंतिम दिन भक्तों का जन सैलाब उमड़ा.

यह आस्था का सैलाब है जो आज सड़कों पर अपने आराध्य के जन्मोत्सव की मस्ती में लीन है. झूमते नाचते गाते लोग पहुंचे हैं स्वयम्बू संकट मोचन के दरबार में. मान्यता है कि इसी स्थान पर पवनपुत्र ने तुलसी दास जी को दर्शन देकर उन्हे राम चरित मानस पूरी करने की प्रेरणा दी. हनुमान जी के चरित्र को आज के संदर्भों में देखें तो ऐसा लगता है कि उनमें भक्तिभाव रखने के साथ उनके चरित्र की भी चर्चा करना चाहिए. श्रीहनुमान जी के चरित्र के मूल में हमें उनका भगवान श्रीराम के प्रति ‘सेवाभाव‘ और ‘भक्ति भाव’’ और श्री सुग्रीव के प्रति मैत्रीभाव सदैव आकर्षित करता रहा है. हम जब उनका स्मरण करता हैं तो ‘सेवक से स्वामी’और ‘भक्त से भगवान’ बनने वाले एक इष्ट की तस्वीर हमारे मस्तिष्क में उभरती है. काशी में ऐसे लोगों की कोई कमी नही जो हर साल इस यात्रा में शामिल होना अपना कर्तव्य समझते हैं.

हनुमान जी की यह तस्वीर भक्तों के मन और मस्तिष्क में इस तरह स्थापित है कि जब वह संकट मोचन जाते हैं तो उनकी वहां स्थापित तस्वीर से अधिक भक्तों के हृदय में स्थापित तस्वीर उनको आकर्षित करती है और उनको लगता है कि साक्षात हनुमान जी उनके सामने हैं. वर्तमान में जब हम जब समाज की हालत देखते हैं तो लगता है कि हनुमान जी चरित्र के मूल गुणों की भी अधिक मुखर होकर करना व्याख्या करना चाहिए ताकि लोग सेवा करने का महत्व समझें और केवल स्वामीपन के अंहकार में न फंसे रहें. भक्ति न सिर्फ शक्ति  बल्कि आनंद भी प्रदान करती है इसका अंदाजा यहाँ आकर ज़रूर हो जाता है.

अध्यात्मिक लोग मानते हैं ऐसी सत्संग चर्चा होती रहना चाहिए. जब हम किसी के अच्छे गुणों की चर्चा करते हैं तो वह धीरे धीरे हम में भी स्थापित हो जाते हैं. और हम कभी किसी के बुराइयों की चर्चा करते हैं तो वह भी हमारे अंदर आ जाती हैं. अपने इष्टों की भक्ति के साथ उनके गुणों का भी बखान करते रहना चाहिए उनसे प्रेरणा मिले.


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