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गुजरात से भागते यूपी-बिहार के लोग

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Oct 8 2018 7:52PM
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राजेंद्र कुमार 

गुजरात फिर गलत वजहों से सुर्खियों में है. इस बार गुजरात में चौदह महीने की एक बच्ची के साथ बलात्कार की घटना ने एक नई राजनीतिक परिस्थिति पैदा कर दी है. बच्ची जिस समाज की है उसके कुछ लोग इसे खुद पर हुआ हमला मानते हुए सामूहिक रूप से उग्र हो गए हैं. कह सकते हैं कि इस समाज के भीतर भीड़ बनने के तैयार कुछ लोगों को मौका मिल गया है. इसलिए ठाकोर समुदाय के लोगों ने इसमें शामिल आरोपितों की सामाजिक पृष्ठभूमि के सभी लोगों को बलात्कार में शामिल समझ लिया है, और अब ये लोग गुजरात में रह रहे यूपी, बिहार तथा मध्य प्रदेश के लोगों को खदेड़ने में जुटे हैं. उन्हें गुजरात छोड़ने के लिए मजबूर कर रहे हैं.

ऐसे माहौल के बीच जिन लोगों को अहमदाबाद की बसों में लद कर तीस-तीस घंटे की असहनीय यात्रा पर निकलना पड़ा है, जिन लोगों को जबरिया ट्रेन से यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश आना पड़ा, और जिन पचास हजार से अधिक लोगों को चंद घटों में ही गुजरात से बाहर होना पड़ा है. उनकी यह पीड़ा पूरे देश को शर्मसार कर रही है. यह कितना दुखद है. यूपी और बिहार के लोगों ने इस मुल्क और गुजरात को सस्ता और उम्दा श्रम देकर संवारा है. ऐसे में हर बात पर या अपनी राजनीतिक को चमाने के लिए उन्हें अब महाराष्ट्र और गुजरात से इस तरह हांक देना ठीक नहीं है. याद करें, इसी गुजरात से 2014 में बसों में भरकर ये कामगार यूपी और बिहार के गांवों में भेजे गए थे ताकि वे नरेंद्र मोदी का प्रचार कर सकें. गुजरात मॉडल का झूठा सपना बांट सकें. मजबूरी में मज़दूर क्या करता चला गया और प्रचार का काम कर आया. आज उन्हीं कामगारों के साथ गुजरात के शहरों और देहातों में मारपीट की घटना सामने आई है. मकान मालिकों ने उन्हें धमकाया है कि राज्य छोड़ दो. इतनी असहनशीलता ठीक नहीं है.

वास्तव में गुजरात में जो घटना घटी है, वह दुखद है, पर इस घटना को लेकर गुजरात बनाम यूपी-बिहार नहीं होना चाहिए. पर यह हो रहा है क्योंकि नेताओं ने लोगों को बांट दिया है. जो लोग आज गुजरात से यूपी, बिहार, तथा मध्य प्रदेश के लोगों को खदेड़ने में लगे हैं, इसमें उनकी ग़लती नहीं है. यह लोग देश में फैल रही नई किस्म की राजनीति का शिकार हो रहे हैं. वास्तव में हाल के दिनों में बलात्कार को राजनीतिक रूप देने के लिए धार्मिक पृष्ठभूमि को उभारा गया ताकि उसके बहाने एक समुदाय दूसरे पर टूट पड़ें. आरोपित मुसलमान है तो हंगामा लेकिन आरोपी हिंदू है और पीड़ित दलित तो चुप्पी, हंगामा करने वालों की लोगों को प्रभावित करने की यह नई रणनीति है. 

आज पीड़िता के साथ हुई क्रूरता के बहाने धार्मिक गोलबंदी का मौका बनाया जा रहा है. यही काम जाति के स्तर पर भी हो रहा है. जो लोग एक घटना को लेकर एक राज्य के लोगों को आरोपित बताने में जुटे हैं, उनके लिए यह एक राजनीतिक मौका भर है, जिसका लाभ लेने की मंशा के तहत ही माहौल खराब करने का प्रयास किया जा रहे हैं. बड़े नेताओं की शक्ल देखकर छोटे स्तर पर भी नेता बनने के लिए लोग यही फॉर्मूला आज़मा रहे हैं. सरकारें ऐसे लोगों को गुजरात में और बिहार में कहीं भी पनपने न दें. परन्तु राजनीतिक लोग हर समय एक मौके की तलाश में रहते हैं. वह पहले धर्म के आधार पर एक अन्य तय करते हैं फिर जाति के नाम पर, फिर भाषा के नाम पर. ऐसा नहीं है कि यूपी-बिहार में भीड़ नहीं है. बिहार के सुपौल में गुंडों ने अपने मां-बाप और रिश्तेदार के साथ मिलकर लड़कियों के हॉस्टल पर हमला कर दिया. पैतीस लड़कियां घायल हैं. इन लड़कियों ने रोज़ाना की छेड़खानी का विरोध किया था.

फिर भी आज देश में लड़कियों के साथ अपराध की घटनाएं लगातार बढ़ रही है. अखबारों में रोज ही लड़कियों के साथ रेप की घटनाओं से पेज रंगे रहते हैं. लगता है कि बारह से सोलह साल की लड़कियों पर पूरा समाज टूट पड़ा है. बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में एक बालिका गृह में क़रीब चालीस लड़कियों का शोषण हुआ, वहां के समाज में कोई हलचल नहीं हुई. कश्मीर में भी एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, पर कश्मीर में लोगों ने एक किसी समुदाय को दोषी नहीं ठहराया. पर गुजरात में जो हो रहा है, वह निंदनीय है, और गुजरात के सभी दलों ने इस घटना की निंदा की है. ठाकोर समाज के नेता अल्पेश ठाकोर ने भी निंदा की है और अपील की है. वहां की सरकार ने भी उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के लोगों को भगाने की घटना की भी निंदा की है. गुजरात पुलिस इस मामले में सक्रिय है. धमकाने वाले तीन सौ से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया है. ठाकोर समाज के लोगों ने भाजपा का विरोध किया था. फिलहाल इस मामले में गुजरात पुलिस ने सख़्ती बरती है. चीफ सेक्रेटरी और पुलिस प्रमुख ने सक्रियता दिखाई है.

फिर भी कुछ लोग इस घटना को राजनीतिक रंग देने में जुटे हैं. इसलिए इस मामले में दोनों तरफ के समाज को समझाने की ज़रूरत है. क़ानून का भरोसा देने के लिए और बलात्कार के ख़िलाफ़ समाज को जागरूक बनाने के लिए काम करना होगा. लोगों को यह समझना होगा कि वह भीड़ के बहकावे में न आए. भीड़ के दुश्मन तय हैं और वह अपने राजनीतिक आकाओं को फायदा पहुंचाने के लिए भी सक्रिय होती है. लोगों का यह सोचना होगा है कि भीड़ के उकसावे से किसे लाभ होगा. सोशल मीडिया पर भीड़ बनाने की फैक्ट्री है. यह भीड़ हमें असुरक्षित कर रही है. हम बिना कुछ समजे ख़ुद को इस भीड़ के हवाले कर रहे हैं और भीड़ के नाम पर समाज और सरकार में गुंडे पैदा करने लगे हैं. बेशक आक्रोश की बात है लेकिन सज़ा कैसे मिले, सिस्टम कैसे काम करे इस पर फोकस होना चाहिए. यह नहीं हो रहा है, इसलिए चंद लोगों की एक भीड़ और सोशल मीडिया पर जारी हुए चंद वीडियों गुजरात से यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश के लोगों को खदेड़ने की आवाज लगाते हैं और बड़े नेताओं की बोलती बंद हो जाती है. इसलिए अब जो कुछ लोग या संगठन किसी राज्य से यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश के लोगों को खदेड़े तो जो लोग इसमें शामिल हों उनके साथ नरमी न हो. यही नहीं किसी अपराध में जो आरोपित हो उसको सजा देने की व्यवस्था हो पर बाकियों को क़सूरवार क्यों समझा जाए. ऐसा होने पर ही समाज में बेहतर समाज हम बना सकेंगे और इसके लिए अभी राजनीतिक दलों को अपने आपसी विवादों को किनारे रखते हुए गुजरात सरीखी घटनाओं का विरोध करना होगा. 

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं.)


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