आप यहां हैं : होम» देश

चौकीदार बेहाल, सियासतदां बेपरवाह!

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Mar 17 2019 5:16PM
Main-Bhi-Chowkidar_201931717167.jpg

राजेन्द्र कुमार

आजाद भारत में हाशिये पर पहुंच चुका चौकीदार अचानक ही महत्वपूर्ण हो गया है. कांग्रेस अध्यक्ष  राहुल गांधी अपनी हर सभा में चौकीदार चोर है, चौकीदार चोर है, के नारे लोगों से लगवा रहे हैं. राहुल गांधी के इस कदम से बीजेपी नेताओं की बेचैनी बढ़ी तो पीएम मोदी ने आज पहल की. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज ट्विटर पर अपना नाम बदल दिया. उन्होंने- मैं भी चौकीदार हूं, कैंपेन के तहत अपने ट्विटर हैंडल का नाम बदलते हुए चौकीदार नरेन्द्र मोदी कर लिया है. पहले यह नाम नरेन्द्र मोदी था. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी ट्विटर पर अपने नाम के आगे चौकीदार लगा लिया. पार्टी के दो प्रमुख नेताओं को देखकर अब बीजेपी के सभी प्रमुख नेता और कार्यकर्ता नाम बदलने की रेस में शामिल हो गए हैं.

यानि चौकीदार के नाम से एक राजनीतिक अभियान की शुरुआत देश में हो गई है. अब दूसरी हकीकत यह है कि अंग्रेजों के बनाए चौकीदार तंत्र में मात्र डेढ़ हजार रुपए प्रति माह का मानदेय पाने वाला यूपी का चौकीदार बेहाल है. इतने मानदेय में एक चौकीदार अपने परिवार को कैसे पालता होगा? इसे लेकर कोई नहीं सोच रहा. यूपी सरकार भी चौकीदारों के मानदेय को बढ़ाने की  दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ चाहते हैं कि चौकीदार को सूबे में ग्राम प्रहरी कहा जाए. बीते साल वाराणसी में ग्राम चौकीदारों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह ऐलान किया था कि यूपी में चौकीदार नहीं बल्कि अब यह ग्राम प्रहरी कहे जाएंगे. वास्तव में सूबे की सरकार को तो चौकीदार की बदहाली खत्म करने से अधिक चौकीदार के नाम पर शुरु हुई राजनीति में ज्यादा रुचि है. यही वजह है कि रविवार को उन्हीं योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अभियान 'मैं चौकीदार हूं ' में शामिल होते हुए कहा है कि उन्हें इस पर गर्व है. उनकी ही तरह बीजेपी के अन्य बड़े नेता भी पार्टी के शुरु किए गए मैं हूं चौकीदार कैंपेन में शामिल होने का ट्विटर कर रहे हैं.  

कहा जा रहा है कि बीजेपी ने राहुल गांधी के चौकीदार चोर हैं नारे के जवाब में मैं हूं चौकीदार कैंपेन शुरू किया है, और इसका मकसद है कि 2014 में लांच किए गए चायवाले अभियान की तरह इस बार चौकीदार अभियान से जनता को लुभाने का. बीजेपी का ये अभियान जोर पकड़े इसके लिए खुद पीएम मोदी ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक वीडियो जारी कर मैं भी चौकीदार' से चुनावी मुहिम की शुरुआत की है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो के साथ अपने ट्वीट में कहा, आपका यह चौकीदार राष्ट्र की सेवा में मजबूती से खड़ा है, लेकिन मैं अकेला नहीं हूं. हर कोई जो भ्रष्टाचार, गंदगी, सामाजिक बुराइयों से लड़ रहा है, वह एक चौकीदार है. मोदी ने कहा कि हर कोई जो भारत की प्रगति के लिये कठिन परिश्रम कर रहा है, वह एक चौकीदार है. आज हर भारतीय कह रहा है कि मैं भी चौकीदार. पीएम मोदी अक्सर स्वयं को ऐसा चौकीदार बताते आए हैं जो भ्रष्टाचार को अनुमति नहीं देगा और न ही स्वयं भ्रष्टाचार करेगा, लेकिन वह देश में बदहाली के कगार पर खड़े चौकीदार तंत्र को चाक चौबंद करने और चौकीदार के जीवन को खुशहाल बनाने की दिशा में कुछ नहीं कर रहे हैं. 

दूसरी तरफ तमाम दुश्वारियों से गुजरते हुए चौकीदार गांव -गांव में अपनी ड्यूटी अंजाम दे रहा है. वह अपने मानदेय को बढ़ाने की मांग कर रहा है, जिस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही. ये सिलसिला वर्षों से जारी है. गौरतलब है कि ग्रामीण स्तर पर पुलिसिंग को बेहतर बनाने के लिए अंग्रेजों ने देश में ग्राम चौकीदार की व्यवस्था लागू की थी. जिसके तहत अंग्रेजों ने ग्राम चौकीदार का मूल काम गांव में पहरा देना और गांव में हो रही आपराधिक गतिविधियों की रिपोर्ट थानेदार को देना तय किया था. इस व्यवस्था में कोई गड़बड़ न हो इसके लिए पुलिस रेग्युलेशन के अध्याय नौ के पेरा 90 में लिखा गया कि पुलिस के सिपाहियों द्वारा चौकीदार से नीच कार्य नहीं कराये जायेंगे और उनसे सिर्फ सूचनाएं लेकर उस पर कार्रवाई करने की जायेगी. सदियों पुरानी ग्रामीण पुलिसिंग की यह व्यवस्था अब राज्य में घिसट-घिसट कर चल रही है. बीते दिनों कानून व्यवस्था की समीक्षा को लेकर यहां पुलिस अधिकारियों की हुई बैठक में यह सच्चाई उजागर हुई.


बैठक में कई वरिष्ठ पुलिस अफसरों ने कहा कि गांव में लागू ग्रामीण पुलिसिंग की व्यवस्था की लगातार अनदेखी हो रही है. शहरों में तो कई प्रयोग हुए लेकिन राज्य में सक्रिय करीब 55 हजार चौकीदारों की उपेक्षा ही होती रही है. जिसके चलते थानाध्यक्ष चौकीदारों की सूचनाओं पर न ठीक से ध्यान देते हैं और न उन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराते हैं. कुछ अफसरों ने यह भी कहा कि थानेदार चौकीदारों से बेगार कराते हैं. घर के काम लेते हैं और उन्हें घास छीलने जैसे काम में लगाते हैं. इस हकीकत को जानने के बाद भी चौकीदार के जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में तो कोई पहल की नहीं गई और अब  चौकीदार का नाम लेकर सियासत की जा रही है. इसे देख अब लोग चौकीदार बेहाल, सियासतदां बेपरवाह! सरीखे तंज कस रहे हैं. 

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं.) 


देश-दुनिया की अन्य खबरों और लगातार अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें। आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं।