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सवाल चिता से निकलती लपटों से गरम हैं और खाकी नम है

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Sep 10 2018 6:44PM
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आलोक पाण्डेय

लखनऊ. आज अपराधी नहीं बल्कि पुलिस परेशान है. इस परेशानी पर पुलिस का आला हुक्मरान भी फ़िक्रमंद हैं. अपराधियों में कम्पन पैदा कर देने वाले जांबाज़ अफसर इस क़दर तनाव में हैं कि खुद अपनी जान देने पर आमादा हो गए हैं. उन्हें कभी तनाव आफीशियल है तो कभी उन्हीं के घर का तनाव उन्हें खोखला किये दे रहा है लेकिन सवाल यह है कि जिसके पास पूरे समाज के आंसू पोछने का ठेका है वह अपने आंसू किसे दिखाए, किसके कंधे पर सर रखकर अपने आंसू बहाए. क्या उसके सामने सिर्फ एक ही रास्ता बचा है कि तनाव हद से गुज़र जाये तो खुद को ही खत्म कर लो और सारी दिक्कत खत्म. यही हाल में राजेश साहनी ने किया और यही सुरेन्द्र दास ने भी किया.

जांबाज़ यूपी पुलिस

यूपी पुलिस आज ऐसी स्थिति से गुजर रही है कि जहाँ उसे किसी भत्ते की जरुरत नहीं है. उसे प्रमोशन की भी शिकायत नहीं है. वह अपराध को रोक रही है और अपराधी को जेल भी भेज रही है. फिर आपका सवाल होगा की आखिर यह सब क्यों कहा जा रहा है. मसला यह है कि यह खाकी अब खुद से सवाल करने लगी है कि आखिर कितना काम, क्या कभी मिल भी सकता है आराम. क्या घर -परिवार और अपनी निजी ज़िन्दगी को इस इस खाकी से सुकून दे पाएंगे. आज इसी सवाल पर है हमारा मंथन.

यूपी पुलिस अपने कर्तव्यों को किस तरह से निभाती है इसे समझाने के लिए डीजीपी के पीआरओ राहुल श्रीवास्तव की स्क्रिप्ट पर फिल्माई गई 5 मिनट 17 सेकेण्ड की लघु फिल्म काफी हद तक स्थितियां स्पष्ट कर देती हैं. पुलिस के पास परिवार के लिए वक्त नहीं है. ड्यूटी निभाते-निभाते ही ज़िन्दगी कटी जा रही है. इस फिल्म में दिखाया गया है कि यूपी 100 को फोन से सूचना मिलती है कि सड़क पर एक युवक को चाकू मार दिया गया है. पुलिस वहां पहुंचकर घायल युवक को अस्पताल के लिए रवाना होती है लेकिन ठीक उसी वक्त फोन पर पुलिसकर्मी के पास खबर आती है कि उसकी बेटी की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई है. घायल युवक को अस्पताल में छोड़कर पुलिसकर्मी दुर्घटनास्थल के लिए रवाना होते हैं जहाँ उनकी खुद की बेटी की लाश पड़ी है.

इस फिल्म को यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ समेत देश -दुनिया के 18 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं. DUTY  FIRST शीर्षक की यह फिल्म बनाई गई थी तो सोशल मीडिया पर यह ट्रेंड भी हुई थी. इस फिल्म में भूपेंद्र सिंह तोमर ने परिवार से ऊपर कर्तव्य को रखा अपनी बेटी खोई पर किसी दूसरे के घर को बचाया. यह कहानी असल ज़िंदगी की है पर सब ऐसे हों, और सब कैसे हिम्मत कर लें जब अपने घर को लेकर अपना फ़र्ज़ नहीं निभा पा रहे हों और यह कोई और नहीं पुलिस तनाव से गुजर रही है. यह बात यूपी पुलिस के डीजीपी खुद कह रहे हैं तो आज पुलिस के दर्द को लेकर बात करना ज़रूरी हो जाता है.

यह कहानी है यूपी पुलिस के उन अधिकारियों की जो अपराध जगत में खौफ थे. जिनके नाम में ही डर था. जो निडर थे, और जिनके स्वभाव और सरलता और ईमानदारी ऐसी थी कि सभी कायल थे. फिर कैसे हार गए. यह यूपी पुलिस अधिकारी के जांबाज़ कैसे हो गए इतने इमोशनल कि अपनी आत्मरक्षा में दिए हथियार से खुद को मार लिया, और ऐसा क्या हो गया की बाहर की दुनिया से नहीं घर की कलह से आईपीएस  सुरेन्द्र दास ने मौत को गले लगा लिया.

यूपी के डीजीपी ओपी सिंह ने जो कहा वह सच है और होगा ऐसा हम मान भी रहे हैं क्योंकि जिस आईपीएस सुरेन्द्र को देखने कानपुर अस्पताल गए. उसकी ज़िंदगी मौत के बीच की लड़ाई रविवार को खत्म हो गयी, और यह नया होनहार आईपीएस अपनी सर्विस के कुछ महीनों में ही दुनिया छोड़ चला. पुलिस पासिंग आउट परेड में समाज की रक्षा का वचन लेने वाला अपने परिवार की कलह से ही हार गया.

अब अंतिम संस्कार के इस गमगीन मौहाल में भी डीजीपी ने इस नए अधिकारी के खोने का दर्द बयान किया, और सीएम ने ट्विट्टर पर दुःख जताया.

ड्यूटी फ़ास्ट और यूपी पुलिस का स्लोगन कि सुरक्षा आपकी , संकल्प हमारा  के इस वादे में दर्द बहुत है. तभी तो आत्महत्या के लिए सुरेन्द्र ने एक दो नहीं सैकड़ों तरीके ढूंढे, और सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली, और जो कारण निकला वह घर के लोग और परिवार से पता चला कि कलह तो घर में ही थी.

सुरेन्द्र के दिल को जितना खून चाहिए था दिल को नहीं मिल पा रहा था और साँसें रुक गईं, पर सवाल छोड़ गईं कि ऐसे क्या तनाव होते हैं जिन्हें यह थर्ड डिग्री देने वाले भी नहीं झेल पाते हैं. पर तनाव क्या है और मौत क्यों हुई, यह सवाल अभी चिता से निकलती लपटों से गरम भी है और खाकी नम भी है.

आईपीएस सुरेन्द्र के इस दर्द के रिश्ते की कहानी अकेली नहीं है, कुछ महीने पहले भी इसी तरह के काबिल पुलिस अधिकारी राजेश साहनी की मौत ने सबको चौंका दिया था. वह जो आतंकवाद विरोधी टास्क फ़ोर्स में तैनात थे. अपनी ही बंदूक से अपनी ही जान ले बैठे. परिवार ने सीबीआई जाँच की मांग की. तो अधिकारी दोस्त इस बहादुर दोस्त के गम में निराश की आखिर यह क्या हो रहा है. पर किसी ने पारिवारिक तनाव की आशंका जताई तो किसी ने संदिग्ध. मौत की जाँच ज़ारी है.

ATS में अधिकारी राजेश साहनी के अंतिम संस्कार के बाद ही उनकी मौत और समय और परिस्तिथियों को लेकर सवाल होने लगा था.  ATS मुख्यालय लखनऊ में खुद को गोली से उड़ा लिया और परिवार को रोते हुए छोड़ दिया, सब की जुबान पर यही था की शांत रहने वाले साहनी यह कदम नहीं उठा सकते.  जल्दी हार तो मानते ही नहीं थे, फिर क्या दवाब था क्या तनाव था.

यूपी पुलिस हर जिले में अपराधियों के खिलाफ मुड़भेड़ पे मुड़भेड़ कर रही है. खाकी अपराधियों की नकेल कसने में लगी है. ऐसे में यह इस तरह की पुलिस अधिकारियों की मौत कई सवाल खड़े करती है. क्या सब कुछ ठीक है? क्या तनाव व्यक्तिगत, पारिवारिक, और पुलिस बल में इतना हो गया है कि ज़िंदगी से भली मौत लगने लगी है.

यह मौते एक सवाल तो कर ही रही है कि यह किसका, क्यों और कहाँ का तनाव है कि खाकी आज तनाव में रह रही है. क्या यह जलती चितायें किसी दिल पर चोट नहीं कर रही हैं कि असल वजह ढूंढे. इससे पहले कि कहीं देर न हो जाए.


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