आप यहां हैं : होम» देश

क्या आलोचनाओं के दबाव में आ गया है आरएसएस ?

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Sep 12 2018 9:12PM
RSS_2018912211212.jpg

उत्कर्ष सिन्हा 
अब इसे वक्त की ज़रुरत कहें या फिर लगातार हो रही आलोचनाओं का जवाब देने की कोशिश. यह सवाल इसलिए क्योंकि अपनी स्थापना के करीब 9 दशक के बाद आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहली बार खुला सम्मेलन बुला रहा है.

 

आने वाली 17 सितम्बर से आरएसएस नयी दिल्ली में तीन दिन की एक व्याख्यानमाला शुरू कर रहा है. शीर्षक होगा ‘भविष्य का भारत : आरएसएस का दृष्टिकोण. जैसी कि खबरें हैं. इस कार्यक्रम में 60 देश के राजनयिकों, देश के करीब करीब सभी राजनीतिक दल, रिटायर्ड अफसर, और मीडिया के साथ साथ अल्पसंख्यक संगठनों को भी आमंत्रित किया जा रहा है. संघ प्रमुख मोहन भगवत समेत कई विचारक अपने व्याख्यान के जरिये संघ की सोच को बताने की कोशिश करेंगे.

आप कह सकते हैं कि हर संगठन का अधिकार है सम्मेलन करना. मगर इस आयोजन पर चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि यह आरएसएस का पहला प्रोग्राम होगा. जिसमें वह सीधे तौर पर लोगों से बात करके अलग-अलग मुद्दे पर अपनी राय रखेगा.
 

खुद को दुनिया का सबसे बड़ा संगठन कहने वाला आरएसएस बीते कुछ सालों से आरोपों की जद में भी है. यूपीए के शासन काल में संघ पर हिन्दू आतंकवाद को शह देने का आरोप लगा. तो अभी कुछ ही दिनों पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने संघ की तुलना पश्चिम एशिया के अतिवादी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से कर डाली. संघ पर दलित विरोधी होने और मनुवाद का समर्थन करने के आरोप भी लगते रहे हैं और आजादी के आन्दोलन में संघ की भूमिका पर भी आलोचक सवाल खड़े करते रहे हैं.


1925 में डॉ. बलिराम केशव हेडगेवार ने 5 सदस्यों के साथ जिस संगठन की नींव रखी थी. उसकी जड़ें अब दुनिया के 80 देशों में फैले होने का दावा किया जाता है. कुछ समय पहले संघ नेतृत्व ने दावा किया था कि सिर्फ भारत में ही उसके एक करोड़ सदस्य हैं. यानी दुनिया का सबसे ज्यादा सदस्यों वाला संगठन है आरएसएस. कमाल की बात यह है कि आरएसएस का न कोई रजिस्ट्रेशन है और न ही सदस्यों का पंजीकरण होता है. तो समझना होगा कि आखिर कैसे काम करता है आरएसएस.
 

दरअसल आरएसएस की ताकत उसके अधिक अनुषांगिक संगठन हैं. जो अलग अलग विषयों पर समाज के बीच काम करते हैं. आरएसएस के प्रशिक्षित स्वयंसेवक यानी प्रचारक इन संगठनों में भेजे जाते हैं. 

संघ परिवार 

 

- राजनीतिक-धार्मिक संगठन 

* BJP - 11 करोड़ सदस्य
* VHP - मंदिर आंदोलन का अग्रणी संगठन
* बजरंग दल - युवाओं का धार्मिक चेतना संगठन
* दुर्गा वाहिनी - विहिप का महिला विंग 
* 20 अन्य छोटे-बड़े अनुषांगिक संगठन 

- मजदूर-किसान-औद्योगिक संगठन

 
* BMS - देश का सबसे बड़ा मजदूर संगठन 
* BKS - देश का सबसे बड़ा किसान संगठन
* लघु उद्योग भारती - छोटे उद्योगों का संगठन
* सहकार भारती - सहकारी संगठनों का संघ 

- सांस्कृतिक संगठन

 
* संस्कार भारती - कला-संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय
* क्रीड़ा भारती - खेल के क्षेत्र में सक्रिय
* बाल गोकुलम - बच्चों को सांस्कृतिक प्रशिक्षण
* भारतीय इतिहास संकलन योजना - इतिहास लेखन-पुनर्लेखन 

- सामाजिक संगठन

 
* सेवा भारती - 972 अनुसांगिक संगठनों के बीच समन्वय
* दीनदयाल शोघ संस्थान - ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सक्रिय
* अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम - जनजातिय इलाकों में सक्रिय

- शिक्षा संगठन


* अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षणिक महासंघ - टीचर्स एसोसिएशन 
* प्रज्ञा प्रवाह - दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों का संघ
* एबीवीपी - छात्र संगठन - 32 लाख सदस्य 
* विद्या भारती - 24 हजार से ज्यादा औपचारिक-अनौपचारिक स्कूल

- स्वास्थ्य संगठन

 
* नेशनल मेडिको ऑर्गेनाइजेशन - डॉक्टरों का संगठन 
* कुष्ठ रोग निवारण समिति - कुष्ठ निवारण में सक्रिय एनजीओ
* आरोग्य भारती - पब्लिक हेल्थ के क्षेत्र में सक्रिय

- सामुदायिक संगठन


* राष्ट्रीय सेविका समिति - करीब 4 लाख महिलाओं का संगठन 
* राष्ट्रीय सिख संगठन - देश भर में 500 शाखाएं
* राष्ट्रीय मुस्लिम मंच - संघ का मुस्लिम विंग 

इन औपचारिक संगठनों के अलावा भी कई ढेर सारे प्रकल्प ऐसे हैं जो स्थानीय स्तर पर विचार निर्माण के काम में जुटे हुए हैं. 

अपने गठन के बाद से ही आरएसएस अपने उग्र हिंदुत्व और प्रखर राष्ट्रवाद की विचारधारा के कारण चर्चा में रहा है. भारत की आजादी के बाद संघ की पहली आलोचना राष्ट्र ध्वज को नकारने के कारण हुई. संघ ने तिरंगे को नकारते हुए भगवा ध्वज को राष्ट्र ध्वज बनने की मांग की थी. इसके बाद महात्मा गाँधी की 1948 में हुई हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इस प्रतिबन्ध को ख़त्म करने की शर्तों में एक शर्त तिरंगे को स्वीकार करना और उसे सम्मान देना भी था.

संघ पर दूसरी बार प्रतिबन्ध अयोध्या में बाबरी ढांचे के गिरने के बाद लगाया गया. यह प्रतिबन्ध भी कुछ दिनों बाद हटा लिया गया.

आरएसएस खुद को राष्ट्रवादी संगठन कहता है और सांप्रदायिक तुष्टिकरण को ख़त्म करने का संघर्ष करता दिखाता है. मगर आलोचक उसे हिन्दूवाद को बढ़ाने और अल्पसंख्यक विरोधी सोच रखने के आरोपों के जरिये घेरने की कोशिश करते हैं. 

ऐसे समय में जब देश में संघ आधारित भारतीय जनता पार्टी का शासन है और राष्ट्रपति जैसे शीर्ष पद पर भी संघ का एक स्वयंसेवक बैठा हो. उस वक्त अगर पहली बार आरएसएस खुले सम्मेलन की सोचे तो उसका विश्लेषण करना भी जरूरी हो जाता है.

सवाल कई हैं. क्या आरएसएस खुद पर हो रहे तेज हमलों के बाद अपनी सफाई देना चाहता है? या फिर अब तक के अपने सर्वोत्तम दौर में आरएसएस विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात कह कर अपने प्रभाव क्षेत्र को एक साथ कई गुना विस्तार देने की कवायद में जुटा है? 

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं.)


देश-दुनिया की अन्य खबरों और लगातार अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें। आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं।