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रावण की रिहाई से उठते सवाल

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Sep 14 2018 5:01PM
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उत्कर्ष सिन्हा 

 

पश्चिम यूपी के सियासी मैदान में सियासी समीकरणों में भाजपा के लिए अब एक और नयी चुनौती सामने आ गयी है.
 

साल 2017 में सहारनपुर में हुए दलित राजपूत विवादों के बाद चंद्रशेखर रावण को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद चंद्रशेखर पर NSA लगा दिया गया. करीब 9 महीने NSA में बंद रहने के बाद चंद्रशेखर की माँ ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी. जिसके बाद अचानक चंद्रशेखर की रिहाई गुरुवार की देर रात करीब पौने तीन बजे हो गयी.
 

भीम आर्मी के लीडर चंद्रशेखर रावण की रिहाई के बाद तो उनके तेवर बीजेपी के लिए फ़िक्र का नया सबब हैं. करीब 15 महीने जेल में बिताने के बाद बाहर आए चंद्रशेखर ने बीजेपी पर सीधा हमला बोला है.
 

चंद्रशेखर के बयान से बसपा सुप्रीमो मायावती को भी राहत मिली है. चंद्रशेखर ने अपनी राजनीति का खुलासा करते हुए मायावती को बुआ बताया और बीजेपी को जड़ से उखाड़ने की बात भी कही.
 

चंद्रशेखर की इस अचानक रिहाई के बाद दो बातें गौर करने वाली हैं. पहली यह कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के ठीक पहले सरकार ने अचानक उसे क्यूँ रिहा किया? इसके पीछे चंद्रशेखर का तर्क यह है कि उसके केस में कोई दम नहीं था, और सरकार की कोर्ट में किरकिरी होना तय था. जिससे बचने के लिए यह रिहाई हुई, और दूसरी बात यह है कि खुद को दलित विरोधी कहे जाने से परेशान बीजेपी अब अपनी छवि दलित समर्थक की बनाने को जिस तेजी से व्याकुल है. यह रिहाई उसी कड़ी का हिस्सा है.
 

पश्चिमी यूपी की कई सीट ऐसी हैं जहाँ दलित वोट ही हार जीत का फैसला करते हैं. चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के बाद जिस तेजी से उसका समर्थन बढ़ा है उससे बीजेपी को मुश्किल होना तय है, लेकिन साथ ही ये भी ध्यान रखना होगा कि चंद्रशेखर की पार्टी पर सरकार की सहानुभूति का क्या असर इस इलाके के राजपूतों पर पड़ता है. एससी एसटी एक्ट आने के बाद बीजेपी का सवर्ण वोटर तिलमिलाया हुआ है. बीजेपी इस संतुलन को कैसे साधती है इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं.

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं)  


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