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एसडीआरएफ ने खोजा चार धाम यात्रा का पौराणिक पैदल मार्ग

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: May 8 2019 1:45PM
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देहरादून. उत्तराखण्ड देव भूमि होने ले साथ-साथ पर्यटन और तीर्थाटन  के लिये भी जानी जाती है. साथ ही यहाँ की ऊंची-ऊंची चोटियां पहाड़ वन और नदियां हैं जिन्हें देखने हर साल लाखों की संख्या में तीर्थ और पर्यटक पहुँचते हैं.

उत्तराखंड की पहचान यहाँ के पैदल रास्ते भी पौराणिक पहचान रखते हैं. हालांकि समय के साथ उत्तराखंड के पैदल पौराणिक मार्ग आवागमन के अभाव में अपनी पहचान खो चुके थे लेकिन अब लोगों के साथ ही आपदा की दृष्टि से इस पैदल मार्ग को तलाश कर उन्हें उकेरने का सफ़ल प्रयास एसडीआरएफ के 13 जवानों और 2 महिला सिपाहियों के साहस ने कर दिखाया है.

20 अप्रेल को देहरादून से चार धाम यात्रा के पौराणिक पैदल मार्ग को तलाशने के लिए यह टीम जीपीएस के साथ ही आधुनिक उपकरणों से लैस होकर अपने चुनौती भरे टास्क के लिये निकली थी.

अनेक यात्राओं के साक्षी रहे यह पैदल मार्ग, जो अनेक स्थानों में टूट गए है, सँकरे है, और अनेक स्थानों में हिमालयी सरंचना की  उठापटक से अपना भौगोलिक स्वरूप बदल चुके हैं. जिन्हें पहचान पाना भी मुश्किल है की खोज का जिम्मा राज्य आपदा प्रतिवादन बल उत्तराखण्ड ने लिया था. इस टास्क को सफ़ल बनाने की जिम्मेदारी  पर्वतारोही निरीक्षक संजय उप्रेती (एवरेस्टर)के नेतृत्व में 20 अप्रैल को एक 15 सस्यीय दल जिसमे दो महिला जवान भी सम्मलित हैं ने लक्ष्मण झूला ऋषिकेश से अभियान का जय घोष किया.

एसडीआरएफ का यह दल अनेक मार्गों को चित्रित करते हुए रुद्रप्रयाग पहुंचेगा. जहां से दो भागों में विभाजित होकर श्री केदारनाथ एवम श्रीबद्रीनाथ धाम पौराणिक मार्ग से होते हुए पहुँचेगा. एक अनुमान के तहत श्रीकेदार धाम की दूरी 250 से 280 किमी एवम श्री बद्रीनाथ धाम की दूरी 300 किमी के लगभग हो सकती है. यह दल मन्दिरों के शीतकालीन कपाट खुलने से पूर्व वहां पहुंचेगा. यात्रा का मुख्य उद्देश्य चारधाम पैदल मार्गों में अवस्थित (शंकराचार्य कालीन) चट्टियों को पुनर्जीवित करने, ट्रैक रूटों की ओर जनमानस को आकर्षित करना, पर्यटन को बढ़ावा देना, एवं साथ ही किसी विषम परिस्थितियों, में वैकल्पिक मागों की खोज कर तराशना है.


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