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स्टील फ्रेम सर्विस में हुआ बंटवारा?

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Mar 3 2019 5:04PM
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राजेन्द्र कुमार

आईएएस, आईपीएस, पीसीएस और पीपीएस प्रदेश में राजकाज का बेहतर संचालन करना इन्हीं चार संवर्ग के अफसरों के हाथों में है. वर्षों से छोटे मोटे टकराव के बीच यह चारों संवर्ग मिलकर राज्य की कानून व्यवस्था से लेकर सभी प्रशासनिक दायित्वों को बेहतर तरीके से निभाते रहे थे, परन्तु अब आईएएस संवर्ग में दो फाड़ हो गए हैं. अब एक ही संवर्ग का हिस्सा होते हुए राज्य में सीधी भर्ती के आईएएस और प्रमोटी आईएएस अफसर अपनी समस्याओं को अलग-अलग सुलझाएंगे. यानि दो भाइयों के बीच अब बंटवारा हो गया है, और अब दोनों मुख्यमंत्री से अपनी पोस्टिंग तथा अन्य समस्याओं के निदान का आग्रह अलग-अलग प्रस्ताव भेजकर किया करेंगे. भारत के किसी राज्य में आईएएस संवर्ग में ऐसा बंटवारा नहीं हुआ है. सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही 2 मार्च 2019 को प्रमोटी आईएएस अफसरों ने अलग राह चुनने का फैसला किया है. संगठन की रूपरेखा तय करने के लिए सूडा के निदेशक उमेश प्रताप सिंह को प्रमोटी आईएएस अफसरों ने संयोजक बनाया है. वह कार्यकारिणी के चयन का कार्य आगे बढ़ाएंगे.

क्यों करना पड़ा ये फैसला?

इस सवाल के जवाब में उमेश प्रताप सिंह ने मीडिया के कुछ साथियों को बताया कहा कि आईएएस एसोसिएशन साल में एक कार्यक्रम करने तक ही सीमित है. हमारा लक्ष्य सिर्फ इतना है कि हम अपने संवर्ग के लोगों की बात शासन के समक्ष प्रमुखता से रख सकें. अक्सर सदस्यों को समस्या आती है या वह कहीं पीड़ित होते हैं तो उनकी बात ठीक से नहीं रखी जाती है. ऐसे में इसके लिए एक सशक्त मंच की जरूरत है. और उसके तहत ही यह कदम उठाया जा रहा है. उमेश प्रताप जो कह रहे हैं, उसके पीछे बहुत कहानियां हैं. जिनका जिक्र वे नहीं करते. यूपी की नौकरशाही में बीते दस सालों से सीधी भर्ती और प्रमोटी आईएएस के बीच टकराव चल रहा है. क्रीम पोस्टों पर प्रमोटी आईएएस की तैनाती नहीं होती. मुख्यमंत्री के पंचम तल में भी इन्हें तैनात नहीं किया जाता. महत्वपूर्ण निगमों में भी इन्हें जिम्मेदारी नहीं दी जाती. यही नहीं इनके साथ में दोयम दर्जे जैसा व्यवहार महत्वपूर्ण बैठकों में किया जाता है. प्रमोटी महिला आईएएस अफसरों को महत्वपूर्ण विभागों में तैनात नहीं किया जाता. यही नहीं प्रमोटी आईएएस अफसरों के पारिवारिक समारोह आदि तक में सीधी भर्ती के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे आईएएस शहर में मौजूद होने के बाद भी नहीं जाते.  

जिससे प्रमोटी आईएएस अफसरों ने अपनी अलग राह लेने की ठानी. आज यूपी में करीब 550 आईएएस हैं, जिनमें प्रमोटी आईएएस अफसरों की संख्या दो सौ से अधिक है. सरकार के तमाम विभागों में प्रमोटी आईएएस अफसर तैनात हैं. मुख्यमंत्री भी उनके काम की तरीफ करते हैं, पर सीधी भर्ती के आईएएस अफसर इनके कामों में नुक्स निकालते हैं. उन्हें वक्त बेवक्त शर्मिंदा करते हैं और बड़े शहरों में महत्वपूर्ण पदों पर तैनात नहीं करते. हालांकि जब अंग्रेजों ने एक मजबूत अखिल भारतीय सेवा के गठन की सोची थी, तब उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाले राज्य में इस संवर्ग में इस तरह की दो फाड़ होगी. 

राज्य के मुख्य सचिव रह चुके एक अधिकारी बताते हैं कि वर्ष 1857 में अंग्रेज शासकों ने नई न्याय व्यवस्था और नई नौकरशाही का सूत्रपात किया था. वर्ष 1860 में भारतीय दंड विधान बना और 1872 में भारतीय साक्ष्य अधिनियम,  जो कुछ संशोधनों के बाद आज भी लागू है. वर्ष 1861 में आइ.सी.एस. एक्ट बना, जिसे अधिकारियों की कर्तव्यनिष्ठा, सेवाभाव और निष्पक्षता के कारण स्टील फ्रेम सर्विस कहा जाने लगा. पुलिस अधिकारियों के लिए ‘आइ.पी.’ सेवा बनी, जिसके अधिकारी पूरे देश में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे. वर्ष 1947 में ‘आइ.सी.एस.’ की उत्तराधिकारी सेवा ‘आइ.ए.एस.’ तथा ‘आइ.पी.’ की उत्तराधिकारी सेवा ‘आइ.पी.एस.’ बनी. इनके अधिकारियों के चयन के लिए प्रथमवार वर्ष 1947 में अखिल भारतीय परीक्षा आयोजित हुई. संविधान निर्माताओं ने इन सेवाओं की सार्थकता को समझते हुए नई अखिल भारतीय सेवाओं के गठन का प्रावधान किया. प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की दूरदर्शिता से ही इन सेवाओं को संविधान के अनुच्छेद 312 के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा मिला. इसी दिशा में अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 1951 संसद ने पारित किया. वर्ष 1966 में तीसरी अखिल भारतीय सेवा, आइ.एफ.एस. (अखिल भारतीय वन सेवा) बनाई गई. अन्य केंद्रीय सेवाओं को सेंट्रल सर्विसेज नाम दिया गया. इन सभी सेवाओं व आइ.ए.एस तथा आइ.पी.एस. के अधिकारियों के चयन की जिम्मेदारी संघ लोकसेवा आयोग और राज्य सेवाओं का चयन संबंधित राज्य के राज्य लोक सेवा आयोग पर छोड़ा गया.

इसी व्यवस्था के तहत चुने गए आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को यह भी समझाया जाता है कि वे प्रशासनिक व्यवस्था रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं. उनमें से यदि एक भी कमजोर पड़ जाए तो गाड़ी सही नहीं चल सकती. वे एक साथ तैरते हैं और एक साथ ही डूबते हैं. उन्हें सिखाया जाता है कि वे प्रशासनिक व्यवस्था में अपना भरपूर सहयोग कैसे करें. देश की अखंडता को अक्षुण बनाए रखने में सकारात्मक भूमिका कैसे निभायें.

ताकि ये स्टील फ्रेम सर्विस अपना वजूद बनाए रखे और प्लास्टिक फ्रेम सर्विस या रबर फ्रेम सर्विस में न बदल जाए. परन्तु आज यूपी में जो हुआ है, वह सवाल उठाता है? क्या एक ही संवर्ग के आईएएस भविष्य में साथ मिलकर काम करेंगे? छोटे-छोटे सरकारी मसलों पर दो विचार उत्पन्न होने पर किसका फैसला अंतिम होगा? सीधी भर्ती और प्रमोटी आईएएस में से जनता किसने पास अपनी समस्या के त्वरित निदान के लिए जाए, यह सवाल भी भविष्य में उठेगा. इसे लेकर रिटायर्ड हो चुके एक मुख्य सचिव कहते हैं कि इस नये विवाद का लाभ नेता लेंगे और जो सरकार सत्ता में होगी, वह इस विवाद को हवा देकर अपने मनमाफिक फैसले करवाएगी. इसलिए बेहतर है कि केंद्र सरकार इस तरफ गंभीरता से ध्यान दे, अन्यथा अन्य राज्यों में भी इसी तरफ पर देरसवेर दो फाड़ होगी. और वह नौकरशाही के लिए ठीक नहीं होगा.

आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीर कुमार इस मसले की गंभीरता को भांपते हुए यह कहते हैं कि चाहे कोई अफसर किसी भी सेवा से आए, जो एक बार हमारे कैडर का हिस्सा बन जाता है वह हमारे लिए बराबर है. सबके हितों का प्रतिनिधित्व किया जाता है. किसी अफसर की व्यक्तिगत सोच को एसोसिएशन की सोच नहीं कहा जा सकता है. उनके इस कथन के बाद यह देखना है कि यूपी और केंद्र सरकार इस मसले पर क्या पहल करती है. सीधी भर्ती के आईएएस और प्रमोटी आईएएस अफसरों के बीच हुई दो फाड़ को खत्म कराती है, या उसे और बढ़ाती है.

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं.)


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