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मौनी अमावस्या पर लगी आस्था की डुबकी

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Feb 4 2019 2:33PM
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वाराणसी / हरिद्वार. मौनी अमावस्या पर धर्मनगरी काशी और हरिद्वार में हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा में आस्था की डुबकी लगाई. काशी में मौनी अमावस्या पर हजारों श्रद्धालुओं ने स्नान किया. गंगा में डुबकी लगाने के बाद लोगों ने गंगा तट पर ही पूजा अर्चना की और सुखी जीवन की मंगल कामना की. वहीं देवभूमि हरिद्वार में लाखों लोगों ने गंगा में स्नान किया. घाटों पर श्रद्धालुओं के अलावा साधु संतों ने भी गंगा में स्नान किया. मौनी अमावस्या पर स्नान के बाद दान का विशेष महत्व है.

90 वर्षों बाद मौनी और सोमवती अमावस्या एक साथ पड़ रही है. गंगा स्नान के लिए श्रद्धालुओं के हुजूम को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई. घाट के आस पास ट्रैफिक को भी डायवर्ट कर दिया गया है.

काशी में सोमवार को मौनी अमावस्या पर उत्तरवाहिनी गंगा का तट श्रद्धा-भक्ति से गुलजार हो उठा. कुंभ के श्रद्धालुओं की रवानगी और वापसी के बीच पतित पावनी में पुण्य की डुबकी लगाने को लोग उमड़ पड़े. दिन निकलने के बाद तटों पर आस्थावानों की लयबद्ध भीड़ शाम तक पहुंचती रही. अन्न-वस्त्र के दान को सीढ़ियों यों पर बेसहारों की ओर हजारों हाथ उठते रहे. अमावस्या का स्नान सुबह से ही आरंभ हो गया था लेकिन बनारस और आसपास के इलाकों के श्रद्धालु का आवागमन देर रात से शुरू हो गया था.

मान महल के सामने मीर घाट, दशाश्वमेध घाट, शीतला घाट से लेकर अहिल्याबाई, डुबकी लगाने के बाद घाट पर तमाम नेमी महिलाएं चावल-हल्दी का टीका बनाकर गीत गाने लगीं. एक तरफ सीढ़ियों से मढि़यों तक दीप जलाए जाते रहे तो दूसरी ओर अर्घ्यदान भी चल रहा था. मौनी अमावस्या का मौन व्रत रखने वाले भक्त इशारों से काम चला रहे थे. घाटों पर अलग-अलग वेश-बाना में भस्मी पोते साधु भी आकर्षण के केंद्र बने थे तो कुछ विदेशी सैलानी भी अपनी अलग स्टाइल को लेकर तमाम आंखों के लिए नजारा बने रहे.

सीढ़ियों पर लंबी कतार में बैठे बेसहारों में भी एक से बढ़कर एक लुक दिखा. कुछ साधु और महिलाएं पिटारे में नाग देवता को लेकर बैठे तो कुछ मनका फेरने की मुद्रा में श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रहे थे. स्नान-ध्यान के बाद घाटों पर अन्न-वस्त्र दान करने की होड़ अलग थी. यह नजारा केदार घाट, हनुमान घाट, शिवाला, ललिता घाट, राम घाट, पंचगंगा घाट, प्रह्लाद घाट, राजघाट पर भी एक जैसा था, लेकिन दशाश्वमेध में मेले जैसा मंजर रहा.


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