आप यहां हैं : होम» देश

सवाल सीबीआई से ज्यादा सरकार की साख का है

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Oct 26 2018 1:41PM
cbi-vs-cbi_20181026134112.jpg

उत्कर्ष सिन्हा 

बीते तीन दिनों से पूरे देश की निगाह सीबीआई में मचे बवाल पर टिकी हुई है. देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी फिलहाल खुद ही जांच का विषय बन गयी है. 

दिल्ली में हल्की-हल्की बहती सर्द हवाओं के बावजूद गुरुवार की सुबह सीबीआई से जुड़े एक नए विवाद से गर्म हो गयी. जब जबरन छुट्टी पर भेजे गए सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा के घर के बाहर चार लोगों को पकड़ा गया. यह चारो इंटीलिजेंस ब्यूरो के कर्मचारी निकले जिनके पास से बाकायदा आईडी कार्ड भी मिले. वर्मा ने फ़ौरन इसे सरकार द्वारा खुद की जासूसी का आरोप लगा दिया तो राजधानी में हडकंप मच गया. आईबी ने इसे अपनी रूटीन कार्रवाई तो बता दिया लेकिन कांग्रेस को बैठे बिठाये एक मुद्दा जरूर मिल गया.

इस बीच अलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेजे जाने का मामला भी तूल पकड़ता रहा. लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने इसे नियम विरुद्ध बताते हुए एक पत्र जारी किया.

शाम होते होते सरकार बैकफुट फूट पर आ गयी और सीबीआई के प्रवक्ता ने एक बयान देकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की.

सीबीआई की ओर से कहा गया कि ''आलोक वर्मा सीबीआई डायरेक्टर के पद पर बने रहेंगे, वहीं राकेश अस्थाना भी स्पेशल डायरेक्टर के पद पर बरकरार रहेंगे, जब तक CVC इस मामले की जांच पूरी नहीं कर लेती तब तक एम नागेश्वर राव सीबीआई डायरेक्टर के कामकाज की निगरानी रखेंगे''.

सीबीआई के कार्यकारी निदेशक बनाए गए नागेश्वर राव को लेकर भी विपक्ष सवाल उठा रहा है. डीएमके नेता स्टॅलिन ने नागेश्वर राव पर भ्रष्टाचारियों की मदद करने का आरोप लगाया तो कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंन्घ्वी ने सरकार पर नियम के खिलाफ जाने का आरोप लगा दिया, लेकिन सरकार के मंत्री और पूर्व नौकरशाह आर के सिंह ने अफसरों को छुट्टी पर भेजने को जायज ठहराया.
लेकिन इन सबके बीच इस पूरे मामले को समझना बहुत जरुरी है कि आखिर वह कौन सी वजहें थी जिसके कारण सीबीआई खुद ही विवादों के घेरे में फंस गयी है.

इसे समझने से पहले एक नजर डालते हैं अब तक के घटनाक्रम पर.

ऐसे बढ़ा विवाद 
21 अक्टूबर-  CBI ने स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के खिलाफ घूसखोरी का केस दर्ज

22 अक्टूबर-  CBI के डीएसपी देवेंद्र कुमार की गिरफ्तारी 
23 अक्टूबर-  राकेश अस्थाना ने निदेशक पर लगाये आरोप 
23 अक्टूबर-  CBI ने कहा DSP देवेंद्र कुमार जबरन वसूली रैकेट का हिस्सा 
23 अक्टूबर-  राकेश अस्थाना FIR के खिलाफ पहुंचे हाईकोर्ट 
24 अक्टूबर-  ज्वॉइंट डायरेक्टर एम. नागेश्वर राव को CBI डायरेक्टर का प्रभार
24 अक्टूबर-   आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को सरकार ने छुट्टी पर भेजा
25 अक्तूबर-   आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में डाली याचिका 
26 अक्तूबर-   आलोक वर्मा वर्मा ने खुद की निगरानी का लगाया आरोप 
इस पूरे विवाद ने सीबीआई की कई महत्वपूर्ण जांचों को भी प्रभावित किया है. यह जांचें भ्रष्टाचार के मामलों की तो हैं ही मगर इनके सियासी रिश्ते भी खूब हैं.

डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना इन मामलों की जांच कर रहे थे.

आलोक वर्मा 
• राफेल फाइटर डील में कथित अनियमितताओं के खिलाफ शिकायत
• भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) रिश्वत में जस्टिस कुद्दूसी की जांच 
• इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एस एन शुक्ला के भ्रष्टाचार की जांच 
• सुब्रमण्यम स्वामी के आरोप पर वित्त सचिव हंसमुख अधिया की जांच 
• कोयला खानों के आवंटन का मामला
• स्टर्लिंग बायोटेक मनी लॉन्ड्रिंग मामला
राकेश अस्थाना 
• अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाला 
• विजय माल्या का बैंकों के साथ धोखाधड़ी का मामला
• सीआरसीटीसी होटल लीज मामले में लालू प्रसाद यादव की जांच 
• शारदा चिंटफंड, रोज वैली, नारदा घोटाले सहित और कई चिट-फंड मामले 

तो जाहिर है कि इन दोनों अफसरों के पास ऐसे मामलों की जांच थी जिनमे ज्यादातर में बड़ी सियासी हस्तियों की संलिप्तता के आरोप रहे हैं. सीबीआई के पास ऐसे ही कई बड़े मामले और भी हैं. इनमें यूपी का NRHM घोटाला जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का नाम लिया जाता है, नोएडा के इंजीनियर यादव सिंह की जांच, वाईएसआर नेता जगन रेड्डी के खिलाफ जांच तो है ही. साथ ही बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण हैं.

लेकिन यह जानना भी जरूरी है कि आखिर सीबीआई के दो बड़े अफसरों के बीच ऐसा क्या हुआ था जिसकी वजह से सीबीआई पर इतने दाग लगने लगे हैं. आइये इसे भी समझने की कोशिश करते हैं.

ऐसे बढ़ी अदावत

अस्थाना की CBI में नियुक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में PIL 
डायरेक्टर आलोक वर्मा ने CVC से अस्थाना के प्रमोशन का विरोध किया 
CVC ने एकमत से अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर नियुक्त किया. 
12 जुलाई को CVC की बैठक में अस्थाना की मौजूदगी का डायरेक्टर ने विरोध किया.
24 अगस्त को अस्थाना ने  आलोक वर्मा पर 2 करोड़ की रिश्वत का आरोप लगाया.
अस्थाना ने वर्मा के खिलाफ 10 और मामलों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. 
सरकार ने यह मामला CVC के हवाले कर दिया. 
आलोक वर्मा ने 6 मामलों में अस्थाना की भूमिका जांच होने की बात कही. 
CVC ने अस्थाना की सिफारिश वाले अफसरों का कार्यकाल बढ़ाया.
आलोक वर्मा ने इन अफसरों का विरोध किया था. 

दिल्ली के गलियारों में गुजरात कैडर के आईपीएस राकेश अस्थाना को पीएम नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का करीबी माना जाता है, और कयास ये भी लगाये जा रहे थे कि राकेश अस्थाना सीबीआई के अगले चीफ हो सकते हैं.

सरकार जिस तरह से इस मामले को हैंडल कर रही है वह भी सवालों के घेरे में है. खुद बीजेपी के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने पूरी कार्रवाई पर कई सवाल उठाये. स्वामी ने इस पूरे मामले के पीछे सरकार में प्रभावी एक चौकड़ी का हाथ बताया, और कहा कि यह चौकड़ी अब ईडी के कई इमानदार अधिकारियों को हटाने की कोशिश में है. जो भ्रष्टाचारियों को बचाने की कोशिश का हिस्सा है.

सीबीआई के घमासान को कांग्रेस अब राजनीतिक मुद्दा बनने की तैयारी में है. उसका इरादा है कि देश भर के सीबीआई मुख्यालयों के सामने प्रदशन किया जाए और इसके जरिये नरेन्द्र मोदी की भ्रष्टाचार के खिलाफ तेवर दिखाने वाली इमेज को एक चोट और मारी जाए. वह इसे पीएम नरेन्द्र मोदी और राफेल डील से जोड़ना नहीं चूक रही. अपने चुनावी दौरे से लौटे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने दिल्ली पहुंचते ही प्रधानमंत्री पर तीखे बाण छोड़े. राहुल ने आरोप लगाया कि ये सारी कवायद पीएम मोदी को बचने के लिए की जा रही है. राहुल ने आधी रात की कार्रवाई को सबूत मिटाने के लिए की गयी कवायद बताते हुए कहा कि पीएम राफेल डील में सीधा फंसे हैं. इसलिए ये सारा विवाद हो रहा है.

तो साफ़ है कि अभी ये विवाद थमने वाला नहीं. मोदी सरकार इस पूरे मामले में CVC को आगे कर खुद का पल्ला झाड़ रही है, लेकिन कांग्रेस इसे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल करने से नहीं चूक रही. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में आलोक वर्मा की याचिका की सुनवाई होगी तो बहुत कुछ साफ़ हो जायेगा, लेकिन इस पूरे विवाद ने सीबीआई की साख पर सवाल तो खड़े कर ही दिए हैं. सीबीआई के भीतर गुटबाजी और मनमाने रवैये से उपजा भ्रष्टाचार भी अब खुल कर सामने आने लगा है. साथ ही साथ केन्द्र सरकार पर भी कई सवाल उठ रहे हैं. सवाल यह है कि अगर सरकार को इस मामले की जानकारी पहले से थी तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गयी? सवाल यह भी है कि क्या सीबीआई में चल रही इस अंदरूनी उठापटक को सत्ता के एक मजबूत केन्द्र की शह थी? और सवाल ये भी है कि गुड गवर्नेंस का नारा देने वाली सरकार आखिर इस मामले को सही तरीके से निपटाने में चूक क्यों गयी? इस पूरे मामले में सीबीआई की साख को तो धब्बा लगा ही है, मगर खुद को मजबूत सरकार होने का दावा करने वाली मोदी सरकार पर भी बड़ा धब्बा लग गया है.

(लेखक नेशनल वाइस में एसोसियेट एडीटर हैं)


देश-दुनिया की अन्य खबरों और लगातार अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें। आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं।