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यह पत्थर जमाने से यहीं खड़े हैं

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Jan 7 2019 11:18AM
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रंगेश सिंह

सोनभद्र. उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित चोपन ब्लाक में पड़ने वाले अगोरी गांव में 1600 संवत से बना अगोरी किला अपने आप में रहस्यमय ढंग से आज भी अपनी गाथा बयान कर रहा है. दो राजवंशों की कहानी कहता यह किला सोन नदी किनारे बसे तीन नदियों के संगम स्थल का गवाह है, जहाँ सोन, विजुल और रेणु नदी का संगम जो कि वरुण पुराण में आज भी अपना स्थान पक्का किया हुआ है. अगोरी किले में चंदेल और खरवार राजवँशों की गाथा लिखी है, सोन नदी के किनारे खड़ा वीर लोरिक का पत्थर एक प्रेम कथा को अपने में समेटे है.

बताया जाता है कि इस नदी के किनारे अगोरी नाम का एक राज्य था. उस राज्य के राजा का नाम मोलागत था. मोलागत वैसे तो बहुत अच्छे राजा थे लेकिन उनके ही राज्य में रहने वाला मेहरा नाम का एक यादव युवक उन्हें पसंद नहीं आता था, क्योंकि मेहरा बलशाली था. राजा की हुकूमत की उसे परवाह नहीं थी, और अपने इलाके में उसकी अपनी हुकूमत चलती थी. राजा हमेशा मेहरा को फंसाने की तरकीब खोजते रहते थे.

एक दिन उन्होंने मेहरा को जुआ खेलने की दावत दी. प्रस्ताव यह रखा गया कि जुए में जो जीतेगा वही इस राज्य पर राज करेगा. मेहरा ने राजा के प्रस्ताव को मान लिया. जुआ शुरू हुआ. राजा को उम्मीद थी कि वह जीत जाएंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं है. एक एक कर राजा सब कुछ हारने लगा और एक वक्त वह भी आया जब राजा सब कुछ हार गया. शर्त के हिसाब से राजा को अब अपना राज पाट छोड़ना पड़ा. राज पाट छोड़कर वह पश्चिम दिशा की ओर निकल पड़ा.

राजा की ऐसी दुर्दशा देखकर भगवान ब्रह्मा साधु के वेश में उनके पास आये और कुछ सिक्के देकर कहा कि जाओ एक बार जुआ खेलो. तुम्हारा राज-पाट वापस हो जाएगा. राजा ने ऐसा ही किया. इस बार मेहरा हारने लगा. वह छह बार हारा. अब उसके पास हारने के लिए कुछ भी नहीं बचा. वह अपनी पत्नी को भी हार गया. उसकी पत्नी गर्भवती थी. सातवीं बार वह अपनी पत्नी का गर्भ भी हार गया.

राजा ने उदारता दिखाते हुए कहा कि अगर बेटा हुआ तो अस्तबल में काम करेगा और अगर बेटी हुई तो उसे रानी की सेवा में नियुक्त कर दिया जाएगा. हारा हुआ मेहरा कुछ नहीं कर पाया, लेकिन कहानी यहां एक अजीब मोड़ पर आती है. मेहरा की सातवीं संतान के रूप में एक बड़ी ही अद्भुत बच्ची का जन्म हुआ. नाम रखा गया मंजरी. राजा को जब पता चला तो उसने मंजरी को बुलाने के लिए सिपाही भेजे. मंजरी की मां उसे भेजने से मना कर दिया. मंजरी की मां ने राजा को संदेश भिजवाया कि जब मंजरी की शादी हो जाएगी तो उसके पति को मारकर मंजरी को ले जाना.

राजा ने यह बात मान ली. देखते ही देखते मंजरी जवान भी हो गई. फिर माता पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी. मंजरी को पता था कि उसका वर कौन है. वह कौन है जो शादी के बाद राजा को हरा सकेगा. मंजरी ने अपने मां बाप से कहा कि आप लोग बलिया नाम की जगह पर जाओ. वहां लोरिक नाम का एक नौजवान मिलेगा. उससे मेरे जन्मों का नाता है और वही राजा को हरा भी सकेगा. मंजरी के पिता लोरिक के घर गए और दोनों का रिश्ता तय हो गया.

लोरिक डेढ़ लाख बारातियों को लेकर मंजरी से शादी करने निकला. वह सोन नदी के इस किनारे पहुंचा लेकिन राजा अपने सैनिकों के साथ उससे लड़ने पहुंच गया. युद्ध में लोरिक हारने लगा. मंजरी एक असाधारण लड़की थी. वह लोरिक के पास गई और उससे कहा कि अगोरी के इस किले के पास ही गोठानी नाम का एक गांव है. वहां भगवान शिव का एक मंदिर है. तुम जाओ भगवान की उपासना करो. इस युद्ध में जीत तुम्हारी ही होगी.

लोरिक युद्ध में जीत गया और दोनों की शादी हो गई. मंजरी की विदाई का समय आया तो गांव की दहलीज छोड़ने से पहले उसने लोरिक से कहा कि कुछ ऐसा करो जिससे यहां के लोग याद रखें कि लोरिक और मंजरी कभी इस हद तक प्यार करते थे. लोरिक ने पूछा कि बताओ ऐसा क्या करूं जो हमारे प्यार की निशानी बने ही साथ ही  प्यार करने वाला कोई भी जोड़ा यहां से मायूस नहीं लौटे. मंजरी ने लोरिक को एक पत्थर दिखाते हुए कहा कि इसे तलवार के एक ही वार से काट दो. लोरिक ने ऐसा ही किया. पर एक नई समस्या आ गई. पत्थर तो दो टुकड़ों में हो गया, लेकिन उसका एक हिस्सा पहाड़ से नीचे गिर गया. मंजरी ने कहा कि पत्थर को ऐसे काटो कि उसके दोनों हिस्से एक ही जगह पर खड़े रहें. लोरिक ने ऐसा ही किया. यह पत्थर जमाने से यहीं खड़े हैं.


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