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18 साल बाद भी नहीं दूर हो पाईं उत्तराखंड की समस्याएं

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Nov 9 2018 2:56PM
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कोटद्वार. एक दशक से अधिक की लंबी लडाई के साथ ही सैकड़ों कुर्बानियों के बाद आज ही के दिन 9 नवम्बर सन 2000 को अलग प्रदेश उत्तराखंड कि स्थापना हुई, लेकिन 18 वर्ष बाद भी कोई आमूल-चूल परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा है. जिस अवधारणा के साथ राज्य निर्माण की लड़ाई लड़ी गई, वे आज गौण हो गए हैं. जिससे सूबे की जनता अपने को ठगा सा महसूस कर रही है. राज्य में कर्ज का दबाव लगातार बढ़ रहा है. जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है. सड़क, स्वास्थ्य शिक्षा के अभाव में पलायन नहीं रुक रहा है. युवा रोजगार की तलाश में लगातार पलायन कर रहे हैं. कांग्रेस और भाजपा बारी-बारी से सत्तासीन हुई, लेकिन इन 18 वर्षों में जनता को केवल घोषणा और वायदों के सिवाय कुछ नहीं मिला. जिससे स्थानीय जनता में भारी आक्रोश है.

उत्तराखंड की जनता का कहना है कि जो उत्तराखंड पहाड़ों कि वजह से जाने थे, वह पूरी तरह खाली हो चुके हैं और जो गांव अभी बचे हुए हैं उनमें भी लगातार पलायन जारी है. पूरा उत्तराखंड पलायन कि मार झेल रहा है. उत्तराखंड के अधिकांश गांव के घर भूत बंगले में तब्दील हो चुके हैं. जो भी सरकारें आयीं उन्होंने उत्तराखंड की भोली भाली जनता को केवल अपने वोट बैंक तक ही सीमित रखा. उत्तराखंड प्रदेश कि समस्याएं प्रदेश सरकार तक ही नहीं पंहुच पा रही हैं.

जो मुख्यमंत्री इन पहाड़ों से निकले वह ही इन पहाड़ों की हसीन वादियों को भूल गये हैं. पहाड़ का दर्द तो दूर कि बात है. वहीं गृहणी भी सरकार पर तंज कसने में पीछे नहीं हटीं. जिसमें गृहणियों ने कहा कि अलग प्रदेश बनके हमको कोई फायदा नहीं हुआ. जिस परिकल्पना के आधार पर उत्तराखंड कि स्थापना की गई थी. उनके अनुरुप उत्तराखंड प्रदेश नहीं बना.


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