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23 मई को तय होगा वरुण गांधी का भविष्य

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Apr 15 2019 9:46AM
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अजय देव वर्मा

पीलीभीत. पीलीभीत लोकसभा सीट का मतदान तीसरे चरण में 23 अप्रैल को होना है और महागठबंधन के प्रत्याशी हेमराज वर्मा, बीजेपी प्रत्याशी वरुण गांधी के बीच इस बार काटे की टक्कर होने की संभावना है. 35 वर्षों से नेहरू गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका गांधी का इस सीट पर कब्जा रहा है. हालांकि 2009 में उनके बेटे वरुण गांधी ने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत पीलीभीत लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर की थी और भारी मतों से जीते भी थे. उस बीच मेनका गांधी ने आंवला लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन इस बार शायद ऐसा होता नही दिख रहा है क्योंकि सपा बसपा गठबंधन ने भी लोध किसान जाति का प्रत्याशी मैदान में उतारा है.

पीलीभीत बहेड़ी लोक सभा सीट पर लगभग 18 लाख के करीब मतदाता हैं. जिसमें 5 लाख मुस्लिम, 3.5 लाख लोध किसान, 2.5 के करीब दलित मतदाता हैं. जिसे गठबन्धन अपना वोट बैंक मानकर जीत के पक्के दावे कर रहा है.

इस वजह से यहाँ से जीतते रहे हैं मेनका और वरुण

दरअसल मेनका और उनके पुत्र वरुण गांधी यूँ तो पीलीभीत संसदीय क्षेत्र के विकास की पूरी तरह अनदेखी करने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में गांधी परिवार के इन दोनों प्रत्याशी की होने वाली जीत अपने आप मे एक बड़ा सवालिया निशान है. राजनीति के जानकारों का मानना है कि पिछले सभी चुनावों में मेनका और वरुण की टक्कर हमेशा मुस्लिम प्रत्याशियों से होती चली आयी है. जिसके कारण हिंदू मतदाताओं के भारी ध्रुवीकरण का उन्हें सीधा फायदा मिलता रहा है. जो उनकी ताजपोशी का हमेशा एक कारण बना है.

जीत को लेकर प्रत्याशियों के अपने-अपने दावे

पीलीभीत संसदीय सीट पर लंबे समय बाद ऐसा मौका आया है जब गांधी परिवार के प्रत्याशी के सामने कोई मुस्लिम प्रतिद्वंद्वी न होकर लोध किसान बिरादरी का प्रत्याशी उन्हें सीधी टक्कर दे रहा है. सपा बसपा और रालोद गठबंधन के इस प्रत्याशी की इस जीत के दावे के पीछे सबसे बड़ा तथ्य यहाँ के मतदाताओं के जातीय समीकरण का है. इस सीट पर पंजीकृत कुल 1764223 मतदाताओं में सबसे अधिक लगभग 4.5 लाख मुस्लिम मतदाताओं, लगभग 3 से 3.5 लाख लोध किसान मतदाता तथा 2.5 लाख दलित मतदाताओं का सपा, बसपा गठबंधन अपने पक्ष में होने का दावा कर रहा है. इसके अलावा कई अन्य जातियों के मतदाताओं का रुझान भी गठबंधन की ओर देखने को मिल रहा है. जिनमें लगभग 70 से 75 हजार सिक्ख मतदाता लगभग 1.5 लाख कुर्मी मतदाता तथा 80 हजार बंगाली मतदाता सम्मलित हैं.

दूसरी ओर भाजपा प्रत्याशी फिरोज वरुण गांधी अपनी जीत के दावे  के पीछे उनकी उम्मीदों का वह विश्वास झलकता साफ दिखाई देता है  जो विगत 22 बर्षों से लगातार उनकी जीत का परचम लहराता चला आ रहा है. साथ ही चूंकि इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सीधा जुड़ा  हुआ मुद्दा है. यह मुद्दा देश की सत्ता की बागडोर संभालने का है. जिसे लेकर देश की जनता के विरोधी खेमे में इस जिम्मेदारी को संभालने के मुद्दे पर भरोसा नहीं कर पा रही है. ऐसे में चूंकि वरुण गांधी के पास अपनी उपलब्धियों को गिनाने का कोई नया पुराना इतिहास मौजूद भले ही न हो लेकिन नरेन्द्र मोदी के नाम की नाव में बैठकर चुनावी वैतरणी वह अवश्य पार कर लेंगे ऐसा उनका यकीन है.

पीलीभीत संसदीय के क्षेत्र के हालात पर और यहाँ की जनता की समस्याओं पर नजर डाली जाए तो अब तक चुने जाते रहे सांसद  सवालों के कटघरे  में खड़े हुए नजर आते हैं. जिससे बाहर निकल पाने का उनके पास कोई रास्ता नहीं है. गन्ने के बकाया भुगतान से जूझ रहा यहाँ का किसान उस वक़्त मेनका गांधी से खासा खफ़ा दिखायी दिया. जब भुगतान की समस्या के समाधान की उम्मीद लिए गन्ना किसानो ने मेनका गांधी से भेंट की. तब मेनका गांधी ने उनके द्वारा गन्ने की खेती अपनाने पर ही सवालिया निशान लगा दिया.

मानव वन्य जन्तु संघर्ष के मुद्दे पर भी ग्रामीणों को गांधी नेहरू परिवार से कोई सहारा नहीं मिला. तब जबकि पिछले 26 महीनों में बाघ के हमलों में 26 ग्रामीण अपनी जान गवां चुके हैं. विकास से जुड़े शिक्षा, चिकित्सा, सड़क निर्माण, रोज़गार व उद्योग धंधे जैसे बुनियादी मुद्दों की अगर बात की जाए तो इस संसदीय क्षेत्र में सिर्फ और सिर्फ आभाव की तस्वीर उभरती दिखाई देती है. ऐसे में आगामी 22 अप्रैल को होने बाले मतदान के दौरान यहां के मतदाताओं को  इन तमाम समस्याओं का अहसास उनका मतदान करेगा या मोदी की तेज हवा के झोंके में उनका यह एहसास बिखर जायेगा, इसका साक्षी 23 मई  की मतगणना का दिन होगा.


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